
कर्नाटक की राजनीति में इन दिनों भाषा और परंपरा को लेकर हुई एक दिलचस्प बातचीत ने नया रंग भर दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से एक कार्यक्रम के दौरान हल्के-फुल्के अंदाज में पूछा कि क्या उन्हें कन्नड़ भाषा आती है। इस पर राष्ट्रपति ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि उन्हें हर भाषा और परंपरा से बेहद लगाव है और वे कोशिश करेंगी कि कन्नड़ भाषा भी सीखें। राष्ट्रपति का यह उत्तर वहां मौजूद लोगों के बीच उत्साह और गर्व का कारण बना। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि में है, और इस विविधता को समझना ही राष्ट्र की एकता को और मजबूत बनाता है।
हालांकि, इस प्रसंग पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कांग्रेस और खासकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर निशाना साधा। बीजेपी नेताओं ने सवाल उठाया कि क्या सिद्धारमैया में इतनी हिम्मत है कि वे कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी से भी इसी तरह का सवाल कर सकें? बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस केवल राजनीति के लिए ऐसे सवाल उठाती है और भाषा या संस्कृति की वास्तविक चिंता उन्हें नहीं है। भाजपा ने इसे कांग्रेस की ‘दोहरी नीति’ करार देते हुए लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाषा का मुद्दा कर्नाटक में हमेशा से ही संवेदनशील रहा है। कन्नड़ भाषा राज्य की पहचान और गौरव से जुड़ी हुई है। ऐसे में जब भी इस विषय पर कोई टिप्पणी होती है, तो यह जनता के बीच तेजी से चर्चा का विषय बन जाता है। राष्ट्रपति मुर्मू का कन्नड़ भाषा सीखने का संकल्प जहां राज्यवासियों के लिए खुशी का कारण है, वहीं राजनीतिक दल इस अवसर का इस्तेमाल अपने-अपने हित साधने के लिए कर रहे हैं।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति मुर्मू ने यह भी कहा कि भारत जैसे विशाल देश में हर राज्य की अपनी परंपराएं, बोलियां और संस्कृति हैं। इनका सम्मान करना ही राष्ट्र की असली एकता है। उन्होंने कर्नाटक की समृद्ध संस्कृति, कला और साहित्य की भी प्रशंसा की और इसे देश के लिए प्रेरणादायक बताया।
दूसरी ओर, बीजेपी और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि चुनावी राजनीति में भाषा और संस्कृति भी बड़ा मुद्दा बन सकते हैं। जहां कांग्रेस इसे सामान्य संवाद और सहज व्यवहार बताकर आगे बढ़ना चाहती है, वहीं भाजपा इसे राजनीतिक अवसर के रूप में पेश कर रही है।
अंततः, राष्ट्रपति मुर्मू का यह बयान कि वे कन्नड़ भाषा सीखेंगी, कर्नाटक की जनता के लिए सम्मान और गर्व का विषय है। लेकिन राजनीतिक दलों ने इसे तूल देकर एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत में किसी भी सांस्कृतिक या भाषाई मुद्दे को राजनीतिक रंग देने में देर नहीं लगती।



