
दुनिया में कई शहर ऐसे हैं जहां कड़ाके की ठंड पड़ती है, लेकिन जब तापमान -45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाए, तो वहां जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल हो जाता है। साइबेरिया क्षेत्र में स्थित दुनिया के सबसे ठंडे शहरों में गिने जाने वाले इलाकों में सर्दी इतनी खतरनाक होती है कि कुछ ही मिनटों में इंसान का शरीर जम सकता है। इतनी ठंड में सांस लेना तक चुनौती बन जाता है, क्योंकि नाक से ली गई हवा फेफड़ों को झटका दे सकती है। इसके बावजूद यहां हजारों लोग सालों से रह रहे हैं और उन्होंने इस मौसम के हिसाब से अपनी पूरी जीवनशैली ढाल ली है। लोग घरों से बाहर निकलते समय कई परतों वाले ऊनी कपड़े, फर कोट, मोटे जूते और चेहरे को ढकने वाले मास्क पहनते हैं, ताकि त्वचा सीधे ठंडी हवा के संपर्क में न आए। यहां के घर विशेष तकनीक से बनाए जाते हैं, जिन्हें जमीन से ऊपर खंभों पर खड़ा किया जाता है ताकि जमी हुई जमीन (परमाफ्रॉस्ट) से गर्मी का नुकसान न हो। पानी की पाइपलाइन अक्सर जमीन के ऊपर होती है और कई बार लोगों को बर्फ पिघलाकर पानी का इंतजाम करना पड़ता है। गाड़ियों को लंबे समय तक बंद नहीं किया जाता, क्योंकि इंजन जम सकता है, इसलिए कई लोग कार को लगातार चालू रखते हैं। स्कूल-कॉलेज भी तब तक खुले रहते हैं जब तक तापमान एक तय सीमा से नीचे न चला जाए। बच्चों को बचपन से ही ठंड सहने की आदत डाली जाती है। खाने में मांस और वसा से भरपूर डाइट ली जाती है, जिससे शरीर को ज्यादा ऊर्जा और गर्मी मिल सके। बाजार, ऑफिस और सामाजिक गतिविधियां भी इसी सर्दी के अनुसार तय होती हैं। कुल मिलाकर, -45°C की जानलेवा ठंड के बावजूद यहां के लोग यह साबित करते हैं कि इंसान परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल ले तो सबसे कठिन माहौल में भी जिंदगी पूरी रफ्तार से चल सकती है।



