
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में सनातन धर्म के पुनर्जागरण को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि अब वह समय आ गया है जब हिंदू समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, परंपराओं और मूल्यों को पहचानते हुए एकजुट होना चाहिए। उनका मानना है कि सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र प्रणाली है, जो मानवता, करुणा, सत्य और सह-अस्तित्व का संदेश देती है। आज के वैश्विक परिवेश में, जब समाज वैचारिक भ्रम और सांस्कृतिक विघटन का सामना कर रहा है, तब सनातन विचारधारा मार्गदर्शन का कार्य कर सकती है।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि हिंदुओं को किसी से संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आत्मविश्वास के साथ अपनी पहचान को सशक्त करना ही असली उद्देश्य होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की शक्ति उसकी समावेशी प्रकृति में निहित है, जो विविधताओं को स्वीकार करते हुए एकता का भाव पैदा करती है। यही कारण है कि यह परंपरा हजारों वर्षों से जीवित रही है और समय-समय पर स्वयं को नए युग के अनुरूप ढालती रही है।
संघ प्रमुख ने युवाओं से विशेष रूप से आह्वान किया कि वे आधुनिक शिक्षा और तकनीक के साथ-साथ अपनी संस्कृति और इतिहास को भी समझें। उन्होंने कहा कि जब युवा अपनी जड़ों से जुड़ते हैं, तो वे आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और राष्ट्र के प्रति समर्पित नागरिक बनते हैं। सनातन धर्म का पुनर्जागरण किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से जुड़ा हुआ विषय है, जिसका उद्देश्य समाज में नैतिकता और संतुलन स्थापित करना है।
अपने संदेश के अंत में मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू समाज को संगठित होकर सेवा, सद्भाव और राष्ट्रहित के कार्यों में आगे बढ़ना चाहिए। जब समाज अपने मूल्यों पर गर्व करता है और उन्हें व्यवहार में उतारता है, तभी सच्चा पुनर्जागरण संभव होता है। उनका यह आह्वान न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।



