
बांग्लादेश की राजनीति में ‘दो बेगमों’—शेख हसीना और खालिदा जिया—का नाम दशकों से धुरविरोध का प्रतीक रहा है। एक ओर अवामी लीग की नेता शेख हसीना, जो बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं, तो दूसरी ओर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की मुखिया और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की पत्नी खालिदा जिया। दोनों के बीच सत्ता, विचारधारा और विरासत की लड़ाई इतनी तीखी रही कि देश की राजनीति अक्सर ठहराव और अस्थिरता में फंसती रही। इसी पृष्ठभूमि में एक दौर ऐसा भी आया, जब भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) की कूटनीतिक पहल ने इन दोनों विरोधी ध्रुवों को एक साझा उद्देश्य पर लाने में अहम भूमिका निभाई। कहानी 1990 के दशक के उस संवेदनशील समय से जुड़ी मानी जाती है, जब बांग्लादेश में सैन्य प्रभाव, कट्टरपंथ और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही थी, जिसका असर सीधे भारत की सुरक्षा और पूर्वोत्तर की स्थिरता पर पड़ रहा था। भारत के लिए यह जरूरी था कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत हो और सत्ता परिवर्तन शांतिपूर्ण तरीके से हो। बताया जाता है कि इसी लक्ष्य के तहत R&AW ने पर्दे के पीछे संवाद के ऐसे चैनल खोले, जिनसे दोनों बेगमों के बीच न्यूनतम सहमति बन सके। यह सहमति वैचारिक मेल नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बहाली, सैन्य हस्तक्षेप को रोकने और चुनावी प्रक्रिया को स्वीकार करने जैसे साझा बिंदुओं पर केंद्रित थी। खुफिया कूटनीति का यह मास्टरस्ट्रोक इसलिए भी अहम था क्योंकि सार्वजनिक मंचों पर दोनों नेता एक-दूसरे के खिलाफ तीखे हमले करती रहीं, लेकिन बैक-चैनल संवाद ने टकराव को पूर्ण टकराव में बदलने से रोके रखा। इस पहल का परिणाम यह हुआ कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक ढांचा धीरे-धीरे पटरी पर लौटा और सत्ता परिवर्तन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। हालांकि बाद के वर्षों में दोनों बेगमों की प्रतिद्वंद्विता फिर उभर आई, लेकिन उस दौर की यह घटना दक्षिण एशिया की राजनीति में खुफिया एजेंसियों की भूमिका और भारत-बांग्लादेश संबंधों की गहराई को दर्शाती है। यह कहानी बताती है कि कभी-कभी कट्टर विरोधी भी राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक साझा रास्ता चुन सकते हैं—भले ही वह रास्ता परदे के पीछे से होकर ही क्यों न गुजरता हो।



