
उत्तराखंड की पवित्र नंदा देवी चोटी से जुड़ा एक रहस्यमयी मामला दशकों बाद भी चर्चा में बना हुआ है। सवाल यह है कि क्या 1965 में नंदा देवी पर दफन हुआ कथित न्यूक्लियर डिवाइस गंगा नदी के लिए संकट बन सकता है? यह मामला उस समय सामने आया था, जब अमेरिका और भारत ने मिलकर चीन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए नंदा देवी पर एक परमाणु ऊर्जा से चलने वाला ट्रैकिंग डिवाइस लगाने की योजना बनाई थी। बताया जाता है कि खराब मौसम और भारी हिमस्खलन के कारण यह डिवाइस पहाड़ों में ही कहीं खो गया।
इस डिवाइस में प्लूटोनियम जैसे रेडियोधर्मी तत्व होने की बात कही जाती है, जिससे समय-समय पर यह आशंका उठती रही है कि अगर यह बर्फ पिघलने या ग्लेशियर के खिसकने के साथ बाहर आया, तो इससे गंगा और उसकी सहायक नदियों में रेडिएशन फैल सकता है। गंगा करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है, ऐसे में इस तरह की किसी भी संभावना को लेकर चिंता स्वाभाविक है।
हालांकि, इस पूरे विवाद पर भारत के पूर्व परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) प्रमुखों और वैज्ञानिकों ने कई बार स्थिति स्पष्ट की है। पूर्व AEC प्रमुखों का कहना रहा है कि नंदा देवी पर जो डिवाइस खोया था, वह पूरी तरह से न्यूक्लियर बम नहीं था, बल्कि एक रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (RTG) था, जिसका इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाता है। उनके अनुसार, इसमें मौजूद रेडियोधर्मी सामग्री को मजबूत सुरक्षा कवच में रखा गया था, जिससे इसके फैलने की संभावना बेहद कम है।
वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि अब तक नंदा देवी क्षेत्र, आसपास के ग्लेशियरों और गंगा के जल में किसी तरह की असामान्य रेडिएशन वृद्धि दर्ज नहीं की गई है। समय-समय पर किए गए सर्वे और सैंपलिंग में रेडिएशन का स्तर सामान्य पाया गया है, जो यह संकेत देता है कि फिलहाल गंगा के लिए कोई तत्काल खतरा नहीं है।
फिर भी, पर्यावरणविदों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे भविष्य में दबे हुए किसी भी पदार्थ के बाहर आने का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए इस मामले को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञ लगातार मॉनिटरिंग, वैज्ञानिक अध्ययन और पारदर्शिता पर जोर देते हैं, ताकि गंगा और हिमालयी पर्यावरण को किसी भी संभावित खतरे से समय रहते बचाया जा सके।



