
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग राष्ट्र के व्यापक हित में करें। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी युवा आबादी में निहित है और यदि यह शक्ति सही दिशा में संगठित होकर कार्य करे तो देश को आत्मनिर्भर, समृद्ध और सशक्त बनने से कोई नहीं रोक सकता। भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका उद्देश्य समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं को समझते हुए व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना होना चाहिए। उन्होंने युवाओं को तकनीक, विज्ञान, प्रबंधन, कृषि, उद्योग और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में अपनी दक्षता बढ़ाने और नवाचार को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनके अनुसार आज के युवाओं के पास वैश्विक स्तर की जानकारी, संसाधन और अवसर उपलब्ध हैं, लेकिन इन सबका सही उपयोग तभी सार्थक होगा जब उसके केंद्र में राष्ट्रहित और सामाजिक कल्याण की भावना होगी। मोहन भागवत ने कहा कि युवाओं को केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने चरित्र निर्माण, अनुशासन, नैतिकता और सेवा भाव को जीवन का आधार बताते हुए कहा कि इन्हीं मूल्यों से मजबूत राष्ट्र का निर्माण होता है। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और परंपराएं युवाओं को एक मजबूत नैतिक दिशा प्रदान करती हैं, जिनसे प्रेरणा लेकर वे आधुनिक चुनौतियों का समाधान खोज सकते हैं। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे सामाजिक समरसता बनाए रखें, भेदभाव से ऊपर उठें और एकजुट होकर देश की प्रगति में योगदान दें। अपने संबोधन में भागवत ने यह विश्वास भी जताया कि यदि युवा अपनी ऊर्जा, रचनात्मकता और कौशल को सकारात्मक दिशा में लगाएं, तो भारत न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी विश्व में एक आदर्श राष्ट्र बन सकता है।



