
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मर्यादा महोत्सव के अवसर पर संबोधन करते हुए भारत की वैश्विक भूमिका और उसकी मानवीय सोच को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत केवल अपने हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की चिंता करता है और संकट की घड़ी में कई देशों की निस्वार्थ भाव से मदद करता रहा है। मोहन भागवत ने कहा कि भारतीय संस्कृति “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना पर आधारित है, जिसमें पूरी दुनिया को एक परिवार माना गया है। यही कारण है कि जब भी किसी देश पर आपदा आती है—चाहे वह प्राकृतिक आपदा हो, महामारी हो या मानवीय संकट—भारत आगे बढ़कर सहायता का हाथ बढ़ाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कोरोना काल में भारत ने न सिर्फ अपने नागरिकों की रक्षा की, बल्कि वैक्सीन और मेडिकल सहायता के माध्यम से अनेक देशों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई। मोहन भागवत ने यह भी कहा कि भारत की यह सोच किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि मानवता और मर्यादा के मूल्यों से प्रेरित है। मर्यादा महोत्सव के मंच से उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि शक्ति के साथ-साथ संयम और करुणा भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे भारत की इस सांस्कृतिक विरासत को समझें और उसे आगे बढ़ाएं। मोहन भागवत ने कहा कि आज दुनिया भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रही है, क्योंकि भारत ने बार-बार साबित किया है कि वह केवल अपने विकास की बात नहीं करता, बल्कि वैश्विक कल्याण को भी प्राथमिकता देता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि मर्यादा का पालन ही किसी राष्ट्र को महान बनाता है और भारत इसी मर्यादा के कारण विश्व मंच पर सम्मान प्राप्त कर रहा है। उनका यह संबोधन न सिर्फ राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत था, बल्कि मानवता, सहयोग और वैश्विक जिम्मेदारी का भी मजबूत संदेश देता है।



