
आज हम अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों में पृथ्वी को एक खूबसूरत नीले ग्रह के रूप में देखते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों की एक नई रिसर्च ने इस पारंपरिक धारणा को चुनौती देते हुए चौंकाने वाला दावा किया है। अध्ययन के मुताबिक अरबों साल पहले पृथ्वी का रंग नीला नहीं बल्कि बैंगनी हो सकता था। इस थ्योरी के पीछे वजह बताई जा रही है सूक्ष्म जीवों की संरचना और उनके भीतर मौजूद पिगमेंट। वैज्ञानिकों का मानना है कि शुरुआती दौर में पृथ्वी के महासागरों में ऐसे माइक्रोऑर्गेनिज्म बड़ी संख्या में मौजूद थे, जिनमें ‘रेटिनल’ नाम का अणु पाया जाता था। यह अणु सूर्य की रोशनी को अलग तरीके से अवशोषित करता है, जिससे परावर्तित रंग बैंगनी दिखाई दे सकता है। आज पौधों में मौजूद क्लोरोफिल प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के दौरान लाल और नीली रोशनी को सोखता है और हरा रंग परावर्तित करता है, जिससे धरती पर हरियाली दिखती है और अंतरिक्ष से देखने पर नीला-हरा मिश्रण प्रमुख नजर आता है। लेकिन वैज्ञानिकों का तर्क है कि क्लोरोफिल से पहले रेटिनल आधारित जीवन रूप अधिक प्रभावी रहे होंगे। यही वजह रही होगी कि उस समय पृथ्वी की सतह से परावर्तित होने वाला प्रमुख रंग बैंगनी रहा हो। यह विचार सिर्फ कल्पना नहीं बल्कि जैव-रासायनिक साक्ष्यों और आधुनिक एक्सट्रीम वातावरण में पाए जाने वाले जीवों के अध्ययन पर आधारित है। यदि यह परिकल्पना सही साबित होती है तो न केवल पृथ्वी के इतिहास को समझने का नजरिया बदलेगा, बल्कि दूसरे ग्रहों पर जीवन की खोज में भी नई दिशा मिल सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी एक्सोप्लैनेट पर रंगों का विश्लेषण वहां मौजूद संभावित जीवन के बारे में संकेत दे सकता है। ऐसे में बैंगनी या असामान्य रंग भी जीवन की मौजूदगी का इशारा हो सकते हैं। फिलहाल यह शोध बहस का विषय बना हुआ है, लेकिन इतना तय है कि इसने हमारे ‘ब्लू प्लैनेट’ की छवि को लेकर नई जिज्ञासा जरूर जगा दी है और भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।



