
मध्य पूर्व में एक बार फिर भू-राजनीतिक तापमान बढ़ता दिख रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच तल्खियां नई नहीं हैं, लेकिन हालिया सैन्य हलचल ने यह संकेत दिया है कि स्थिति लंबे और जटिल टकराव की दिशा में बढ़ सकती है। अमेरिकी रणनीतिक हलकों में एक ऐसे संभावित ऑपरेशन की चर्चा तेज है, जो समय के लिहाज से काफी लंबा खिंच सकता है और जिसमें सीधे युद्ध के बजाय दबाव, प्रतिबंध, साइबर गतिविधियां और क्षेत्रीय गठबंधनों की अहम भूमिका हो सकती है। दूसरी ओर, ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के नेतृत्व में सैन्य प्रतिष्ठान ने भी साफ कर दिया है कि किसी भी बाहरी कदम का जवाब देने के लिए उनकी तैयारियां पूरी हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मुकाबला पारंपरिक युद्ध से अलग हो सकता है। इसमें समुद्री मार्गों की निगरानी, प्रॉक्सी समूहों की सक्रियता, ड्रोन और मिसाइल क्षमताओं का प्रदर्शन तथा ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी रणनीतियां शामिल रह सकती हैं। फारस की खाड़ी और उसके आसपास का इलाका वैश्विक व्यापार के लिए बेहद अहम है, इसलिए वहां की किसी भी हलचल का असर दुनिया भर के बाजारों पर पड़ना तय माना जाता है। अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ समन्वय बढ़ा रहा है, जबकि ईरान यह संदेश देने में लगा है कि वह दबाव की नीति से पीछे हटने वाला नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दोनों पक्ष फिलहाल शक्ति प्रदर्शन के जरिए बढ़त बनाने की कोशिश करेंगे। खुला युद्ध किसी के हित में नहीं है, लेकिन लंबी अवधि की तनातनी, सीमित झड़पें या अप्रत्यक्ष टकराव की आशंका से इनकार भी नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि कूटनीतिक चैनल भी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या बातचीत का कोई रास्ता निकलेगा या फिर यह खिंचाव आने वाले महीनों में और गहराएगा। फिलहाल इतना तय है कि क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ गई है और हर कदम सोच-समझकर उठाया जाएगा।



