
नेपाल में जेन-जी यानी नई पीढ़ी के आंदोलन के बाद राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदलता नजर आ रहा है। युवाओं ने पारदर्शिता, रोजगार, भ्रष्टाचार पर सख्ती और बेहतर प्रशासन की मांग को लेकर सड़कों पर उतरकर पारंपरिक राजनीति को चुनौती दी। इस आंदोलन ने स्थापित दलों को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है। अब देश चुनावी परीक्षा की ओर बढ़ रहा है, जहां प्रधानमंत्री पद की रेस में तीन बड़े चेहरे सबसे आगे बताए जा रहे हैं।
पहला नाम है पुष्प कमल दहल प्रचंड का, जो लंबे समय से नेपाली राजनीति के केंद्र में रहे हैं। माओवादी पृष्ठभूमि से आने वाले प्रचंड गठबंधन राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। वे अनुभव और संगठन क्षमता के दम पर फिर से सत्ता में वापसी की कोशिश में हैं। हालांकि युवाओं का एक वर्ग पुरानी राजनीतिक शैली से दूरी बनाना चाहता है, जो उनके लिए चुनौती बन सकता है।
दूसरे प्रमुख दावेदार हैं केपी शर्मा ओली। वे राष्ट्रवाद और मजबूत नेतृत्व की छवि के साथ चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। ओली पहले भी प्रधानमंत्री रह चुके हैं और चीन व भारत के साथ संतुलन साधने की नीति को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश करते हैं। लेकिन आलोचक उन्हें राजनीतिक अस्थिरता के लिए जिम्मेदार भी ठहराते रहे हैं।
तीसरा चेहरा है शेर बहादुर देउबा, जो नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। देउबा लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थागत मजबूती की बात करते हैं। उनका अनुभव और पार्टी का पारंपरिक जनाधार उन्हें मजबूत दावेदार बनाता है, मगर युवा मतदाताओं को अपने पक्ष में करना उनके लिए सबसे बड़ी कसौटी होगी।
जेन-जी आंदोलन ने साफ संकेत दिया है कि नेपाल की राजनीति अब केवल पुराने समीकरणों पर नहीं चलेगी। रोजगार, शिक्षा, डिजिटल पारदर्शिता और सुशासन जैसे मुद्दे चुनावी एजेंडा तय करेंगे। ऐसे में यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में बदलाव का भी संकेत हो सकता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता अनुभव को तरजीह देती है या बदलाव की नई लहर को।



