Dr Doom की भारत पर बड़ी भविष्यवाणी, 9% GDP ग्रोथ और नौकरियों पर जोर

नूरीएल रूबिनी अमेरिका के जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, जिन्हें ‘डॉ. डूम’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने 2006 में अमेरिका के आवास और वित्तीय बाजारों में बढ़ते जोखिमों को लेकर चेतावनी दी थी। इसके बाद 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। इसी वजह से रूबिनी की पहचान ऐसे अर्थशास्त्री के रूप में बनी, जो आर्थिक संकट के संकेतों पर पहले से ध्यान दिलाते हैं। अब उन्होंने भारत की आर्थिक संभावनाओं, रोजगार और वैश्विक व्यापार में देश की भूमिका को लेकर अपना आकलन साझा किया है।
भारत को लेकर क्या है नूरीएल रूबिनी की भविष्यवाणी?
रूबिनी का मानना है कि आने वाले दशकों में वैश्विक आर्थिक विकास में भारत की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती है। उन्होंने भारत को बड़ी घरेलू बाजार क्षमता, प्रतिभाशाली कार्यबल और मजबूत आर्थिक संभावनाओं वाला देश बताया है। उनके अनुसार, यदि भारत आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाता है और वैश्विक बाजारों के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को अधिक खुला बनाता है, तो उसकी संभावित विकास दर 8 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है। हालांकि, यह अर्थशास्त्री का आकलन है, कोई सुनिश्चित भविष्यवाणी नहीं। वास्तविक विकास दर घरेलू नीतियों, निवेश, वैश्विक मांग और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
भारत के लिए 9 प्रतिशत GDP ग्रोथ क्यों जरूरी?
रूबिनी ने भारत में रोजगार सृजन को सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक बताया है। उनके मुताबिक, केवल 7 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर युवाओं को पर्याप्त अच्छी नौकरियां देने के लिए काफी नहीं हो सकती और भारत को करीब 9 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। तेजी से बढ़ती युवा आबादी को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा करना जरूरी है। इसके लिए विनिर्माण, निर्माण, निर्यात, तकनीक और सेवाओं जैसे क्षेत्रों में निवेश तथा रोजगार बढ़ाने की जरूरत होगी।
चीन से भारत की ओर क्यों जा सकती हैं कंपनियां?
वैश्विक कंपनियां अब अपनी उत्पादन और सप्लाई चेन को केवल एक देश पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग देशों में फैलाने पर विचार कर रही हैं। इस प्रक्रिया को ‘फ्रेंडशोरिंग’ कहा जाता है, जिसमें कंपनियां राजनीतिक और रणनीतिक रूप से अनुकूल देशों में उत्पादन या आपूर्ति व्यवस्था विकसित करती हैं। रूबिनी के मुताबिक, चीन से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों को लेकर बढ़ती चिंताएं भारत के लिए अवसर पैदा कर सकती हैं। यदि भारत निवेशकों को बेहतर कारोबारी माहौल, मजबूत बुनियादी ढांचा और कुशल श्रमिक उपलब्ध कराता है, तो उसे इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल निर्माण और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में फायदा मिल सकता है।
अमेरिका के टैरिफ में नरमी से भारत को क्या फायदा होगा?
रूबिनी को उम्मीद है कि महंगाई और उपभोक्ताओं की लागत से जुड़े दबावों के कारण अमेरिका भविष्य में अपनी टैरिफ नीति को अधिक व्यावहारिक बना सकता है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में सुधार होने पर भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में बेहतर अवसर मिल सकते हैं। इससे कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग उत्पाद और दूसरे क्षेत्रों की कंपनियों को लाभ मिलने की संभावना है। हालांकि, टैरिफ में वास्तविक बदलाव दोनों देशों की बातचीत, व्यापार समझौतों और नीतिगत फैसलों पर निर्भर करेगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बढ़ेगी रोजगार की चुनौती
रूबिनी ने यह भी चेतावनी दी है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकें रोजगार के स्वरूप को बदल सकती हैं। इसका असर केवल आईटी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कई अन्य पेशों में भी काम करने के तरीकों पर पड़ सकता है। ऐसे में भारत के लिए केवल आर्थिक विकास बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। युवाओं को नई तकनीकों के अनुरूप कौशल देना, व्यावसायिक प्रशिक्षण बढ़ाना और शिक्षा को उद्योगों की जरूरतों से जोड़ना भी जरूरी होगा। इससे बदलते श्रम बाजार में रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने में मदद मिल सकती है।
भारत के सामने अवसर भी, चुनौतियां भी
भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार, युवा कार्यबल और वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने की क्षमता है। लेकिन इन संभावनाओं को वास्तविक आर्थिक लाभ में बदलने के लिए रोजगार सृजन, उत्पादकता, कौशल विकास और विनिर्माण क्षेत्र में सुधार जरूरी होंगे। रूबिनी का आकलन है कि वैश्विक कंपनियों की बदलती रणनीतियां भारत को आगे बढ़ने का अवसर दे सकती हैं। फिर भी, यह अवसर अपने आप आर्थिक सफलता में नहीं बदलेगा। आने वाले वर्षों में नीतिगत फैसले, निवेश का माहौल और रोजगार की गुणवत्ता यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि भारत अपनी विकास क्षमता का कितना लाभ उठा पाता है।



