ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात पर भारत की नजर, चिप से China+1 तक असर
अमेरिका और चीन के राष्ट्राध्यक्षों की आगामी बैठक सिर्फ दो देशों के रिश्तों तक सीमित नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग 24 सितंबर को वॉशिंगटन में मुलाकात करने वाले हैं। इस बैठक से पहले दोनों देशों के बीच व्यापार, AI और टेक्नोलॉजी को लेकर प्रतिस्पर्धा जारी है। ऐसे में भारत के लिए भी इस मुलाकात के नतीजे महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
China+1 रणनीति पर असर
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ने के कारण कई वैश्विक कंपनियों ने अपनी सप्लाई चेन को चीन से बाहर भी फैलाने की रणनीति अपनाई। इसी प्रक्रिया को ‘China+1’ कहा जाता है। भारत इस रणनीति के तहत मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन में निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है।
अगर अमेरिका और चीन के बीच संबंधों में स्थिरता आती है और चीन को लेकर कारोबारी जोखिम की धारणा कम होती है, तो कंपनियों के लिए चीन से बाहर अतिरिक्त उत्पादन क्षमता लगाने की जरूरत कुछ क्षेत्रों में कम हो सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर कंपनियों के लागत, बाजार और सप्लाई चेन से जुड़े फैसलों पर निर्भर करेगा।
चिप और AI सेक्टर पर नजर
सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हैं। अमेरिका ने चीन को उन्नत AI चिप्स और कुछ सेमीकंडक्टर तकनीकों तक पहुंच सीमित करने के लिए कई निर्यात नियंत्रण लागू किए हैं। दूसरी ओर चीन अपनी घरेलू AI और चिप इंडस्ट्री को मजबूत करने पर जोर दे रहा है।
ऐसे में बैठक के दौरान अगर उन्नत चिप्स या सेमीकंडक्टर उपकरणों से जुड़े प्रतिबंधों में कोई बदलाव होता है, तो उसका असर वैश्विक टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञ विश्लेषण में भी AI सहयोग और चिप निर्यात प्रतिबंधों को अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखने पर जोर दिया गया है।
रेयर अर्थ मिनरल्स भी बड़ा मुद्दा
रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिज भी अमेरिका-चीन संबंधों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, रक्षा और ऊर्जा तकनीकों समेत कई उद्योगों में होता है। चीन की प्रोसेसिंग क्षमता इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण है।
अगर दोनों देशों के बीच रेयर अर्थ की सप्लाई को लेकर कोई सहमति बनती है, तो इसका असर वैश्विक कंपनियों की लागत और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है। भारत के लिए भी यह क्षेत्र महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अपनी रणनीतिक खनिज सप्लाई को विविध बनाने पर काम कर रहा है।
भारत-चीन रिश्तों का भी संदर्भ
भारत के लिए यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग ने 12 सितंबर 2026 को BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी। दोनों नेताओं ने व्यापार, सप्लाई चेन और बाजार पहुंच से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की थी। भारत ने संरचनात्मक व्यापार असंतुलन और सप्लाई चेन से जुड़ी चिंताओं को दूर करने की जरूरत भी रेखांकित की थी।
इसलिए अमेरिका-चीन संबंधों में बदलाव का असर भारत की चीन नीति, व्यापार और वैश्विक सप्लाई चेन रणनीति पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है।
रूस और ईरान से जुड़े फैसले भी अहम
ट्रंप-जिनपिंग बातचीत में रूस और ईरान से जुड़े मुद्दे भी भारत के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। चीन के रूस और ईरान के साथ आर्थिक संबंध हैं और अमेरिका इन दोनों देशों को लेकर अलग-अलग प्रतिबंधात्मक नीतियां अपनाता रहा है। इसलिए अमेरिका-चीन के बीच किसी संभावित समझ या छूट का असर ऊर्जा और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है।
क्या अमेरिका-चीन तनाव पूरी तरह खत्म होगा?
फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों से यह संकेत मिलता है कि बैठक का मुख्य उद्देश्य व्यापक ‘ग्रैंड डील’ के बजाय दोनों देशों के बीच संबंधों को स्थिर रखना हो सकता है। AI, व्यापार, ताइवान, ईरान और महत्वपूर्ण खनिज जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी बने हुए हैं।
ऐसे में भारत के लिए बैठक के दौरान किसी एक घोषणा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार एवं टेक्नोलॉजी संबंध किस दिशा में जाते हैं। चिप्स, रेयर अर्थ, सप्लाई चेन और China+1 से जुड़े फैसले आने वाले समय में भारतीय उद्योग और वैश्विक निवेश के माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।



