Google Earth पर मिला 850 फीट का रहस्यमयी घेरा, निकला उल्कापिंड क्रेटर
कभी-कभी अंतरिक्ष से जुड़ी बड़ी वैज्ञानिक खोजें बेहद सामान्य तरीके से सामने आती हैं। ऐसा ही कुछ पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में हुआ, जब सरकारी भूवैज्ञानिक आर्थर हिकमैन जुलाई 2007 में Google Earth पर इलाके की सैटेलाइट तस्वीरें देख रहे थे। इसी दौरान उनकी नजर एक असामान्य और लगभग गोलाकार संरचना पर पड़ी। शुरुआती नजर में यह केवल जमीन पर बना एक प्राकृतिक घेरा लग रहा था, लेकिन इसके आकार और बनावट ने वैज्ञानिक जांच की जरूरत पैदा की।
850 फीट का था पूरा क्रेटर
जिस संरचना को सैटेलाइट तस्वीरों में देखा गया, उसका व्यास करीब 260 मीटर यानी 850 फीट था। यह पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के Ophthalmia Range क्षेत्र में स्थित है। क्रेटर की बाहरी रिम आसपास की जमीन से करीब 30 मीटर तक ऊंची है और इसके भीतर अपेक्षाकृत समतल सतह दिखाई देती है।
यह आकार अपने आप में इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इतनी स्पष्ट गोलाकार संरचना किसी संभावित उल्कापिंड प्रभाव की ओर संकेत कर सकती है। हालांकि केवल सैटेलाइट तस्वीर के आधार पर इसे उल्कापिंड क्रेटर घोषित करना संभव नहीं था।
वैज्ञानिकों ने कैसे की पुष्टि?
संरचना की वास्तविक प्रकृति पता लगाने के लिए 2012 में इसके केंद्र में वैज्ञानिक ड्रिलिंग की गई। ड्रिलिंग करीब 64.7 मीटर की गहराई तक पहुंची। ऊपर की परत में समय के साथ जमा हुआ तलछटी पदार्थ मिला, जबकि नीचे मूल चट्टान के अत्यधिक टूटे हुए हिस्से पाए गए।
इसके बाद ड्रिल कोर और चट्टानों की रासायनिक जांच की गई। खास तौर पर प्लैटिनम ग्रुप तत्वों के अनुपात और निकेल की मात्रा ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा। नमूनों में मिले रासायनिक संकेत उल्कापिंडीय पदार्थ से मेल खाते थे और निकेल की अधिकता ने लोहे वाले उल्कापिंड की संभावना को मजबूत किया।
करीब 10 मीटर का रहा होगा उल्कापिंड
वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक जिस अंतरिक्षीय पिंड ने यह क्रेटर बनाया, उसका आकार करीब 10 मीटर रहा होगा। टक्कर के दौरान इस पिंड ने जमीन में लगभग 260 मीटर चौड़ा क्रेटर बनाया। वैज्ञानिक विश्लेषण इसे लेट प्लाइस्टोसीन काल का बताते हैं और इसकी उम्र लगभग 10,000 से 100,000 साल के बीच आंकी गई है।
दिलचस्प बात यह है कि इतने बड़े प्रभाव के बावजूद यहां वैसी स्पष्ट शॉक डैमेज हर जगह नहीं मिली जैसी बड़े और तेज उल्कापिंड प्रभावों में देखने को मिल सकती है। एक वैज्ञानिक व्याख्या यह है कि वायुमंडल से गुजरते समय अपेक्षाकृत छोटे पिंड की गति काफी कम हुई होगी।
Google Earth बना खोज का जरिया
हिकमैन क्रेटर की कहानी यह भी दिखाती है कि आधुनिक सैटेलाइट मैपिंग और डिजिटल अर्थ-ऑब्जर्वेशन टूल वैज्ञानिकों को जमीन पर मौजूद ऐसी संरचनाएं पहचानने में मदद कर सकते हैं जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में देखना मुश्किल होता है। यहां शुरुआती संकेत किसी प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि सैटेलाइट इमेज को स्क्रीन पर देखने के दौरान मिला था।
हालांकि Google Earth ने खुद क्रेटर की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं की थी। उसने केवल ऐसी संरचना को पहचानने में मदद की, जिसके बाद फील्ड सर्वे, ड्रिलिंग और रासायनिक विश्लेषण के जरिए वैज्ञानिक निष्कर्ष तक पहुंचे।
अंतरिक्ष और पृथ्वी के रिश्ते की अहम कड़ी
उल्कापिंडों के प्रभाव से बने क्रेटर पृथ्वी के इतिहास को समझने में वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनके अध्ययन से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि अतीत में अंतरिक्षीय पिंड पृथ्वी से कब और किस तरह टकराते रहे हैं।
NASA भी ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद इम्पैक्ट स्ट्रक्चर का अध्ययन करता रहा है। ऐसे क्रेटर पृथ्वी की सतह, भूगर्भीय इतिहास और अंतरिक्षीय वस्तुओं के प्रभाव को समझने में उपयोगी वैज्ञानिक रिकॉर्ड प्रदान करते हैं।
क्या आज भी क्रेटर देखा जा सकता है?
हां। हिकमैन क्रेटर पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में मौजूद एक पुष्ट उल्कापिंड प्रभाव संरचना है। इसकी पहचान 2007 में हुई थी और बाद में वैज्ञानिक ड्रिलिंग तथा विश्लेषण से इसके उल्कापिंडीय प्रभाव की पुष्टि हुई। इसी वजह से यह खोज आधुनिक सैटेलाइट इमेजिंग और पारंपरिक भूवैज्ञानिक जांच के सफल मेल का एक उल्लेखनीय उदाहरण मानी जाती है।



