
भारतीय वायुसेना ने स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान (LCA) तेजस की पहली उड़ान की 25वीं वर्षगांठ बड़े गर्व और उत्साह के साथ मनाई। यह अवसर न केवल भारतीय वायुसेना के लिए बल्कि पूरे देश के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है, क्योंकि तेजस आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी रक्षा तकनीक की सफलता का सशक्त प्रतीक बन चुका है। 4 जनवरी 2001 को तेजस ने अपनी पहली उड़ान भरी थी और तभी से यह विमान भारत की तकनीकी क्षमता, वैज्ञानिक प्रतिभा और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में किए गए प्रयासों का प्रमाण रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO), हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और भारतीय वायुसेना के सहयोग से विकसित तेजस ने कई चुनौतियों को पार करते हुए आज एक भरोसेमंद लड़ाकू विमान के रूप में अपनी पहचान बनाई है।
तेजस को अत्याधुनिक एवियोनिक्स, उन्नत रडार सिस्टम, डिजिटल फ्लाई-बाय-वायर तकनीक और हल्के लेकिन मजबूत ढांचे के साथ तैयार किया गया है, जो इसे बेहद फुर्तीला और प्रभावी बनाता है। बीते 25 वर्षों में तेजस ने कई परीक्षणों और उन्नयनों के जरिए अपनी क्षमताओं को लगातार मजबूत किया है। आज यह विमान वायुसेना की अग्रिम पंक्ति की स्क्वॉड्रनों का हिस्सा है और देश की हवाई सीमाओं की सुरक्षा में अहम भूमिका निभा रहा है। तेजस न केवल पुराने लड़ाकू विमानों का विकल्प बनकर उभरा है, बल्कि भविष्य में निर्यात की संभावनाओं के साथ भारत की वैश्विक रक्षा पहचान को भी सशक्त कर रहा है।
25वीं वर्षगांठ के मौके पर वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और पायलटों के योगदान को याद करते हुए कहा कि तेजस भारत के आत्मविश्वास, संकल्प और नवाचार की उड़ान है। यह विमान आने वाले वर्षों में Mk-1A और Mk-2 जैसे उन्नत संस्करणों के साथ और भी ताकतवर बनेगा। तेजस की यह यात्रा साबित करती है कि भारत न केवल अपनी जरूरतों को खुद पूरा कर सकता है, बल्कि रक्षा तकनीक के क्षेत्र में विश्व पटल पर मजबूती से खड़ा हो सकता है।



