मथुरा के फालैन में अद्भुत होलिका दहन: 20 फीट ऊंची ज्वाला से सुरक्षित निकले संजू पंडा

मथुरा के गांव फालैन में हर साल की तरह इस बार भी होलिका दहन का अद्भुत और आस्था से भरा नजारा देखने को मिला। यहां करीब 20 फीट ऊंची सजी-धजी होलिका को विधि-विधान से प्रज्ज्वलित किया गया। जैसे ही आग की लपटें तेज हुईं, पूरा गांव “प्रह्लाद जी की जय” के जयकारों से गूंज उठा। इस दौरान गांव के पुजारी संजू पंडा ने सदियों पुरानी परंपरा को निभाते हुए धधकती होलिका की आग के बीच से सकुशल बाहर निकलकर सभी को अचंभित कर दिया।
फालैन की यह परंपरा देश-विदेश में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यह आयोजन भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका के साथ मिलकर प्रह्लाद को आग में जलाने का प्रयास किया था, तब भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका दहन हो गई। उसी आस्था की याद में फालैन गांव में यह अनोखी परंपरा निभाई जाती है।
होलिका दहन से पहले गांव में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। संजू पंडा करीब एक महीने तक कठोर तप और नियमों का पालन करते हैं। बताया जाता है कि वे इस दौरान जमीन पर ही विश्राम करते हैं और सात्विक आहार ग्रहण करते हैं। होलिका दहन की रात, जैसे ही अग्नि प्रज्वलित होती है, वे नंगे पैर जलती लकड़ियों और अंगारों के बीच से निकलते हैं। इस क्षण को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु और पर्यटक दूर-दूर से फालैन पहुंचते हैं।
इस अद्भुत दृश्य के दौरान सुरक्षा के व्यापक इंतजाम भी किए जाते हैं। प्रशासन और पुलिस बल मौके पर तैनात रहते हैं ताकि आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके। जैसे ही संजू पंडा आग से बाहर निकलते हैं, श्रद्धालु उन्हें कंधों पर उठा लेते हैं और पूरे गांव में भक्ति और उल्लास का माहौल छा जाता है।
फालैन की होलिका केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामूहिक विश्वास का जीवंत उदाहरण है। यह आयोजन हर साल लोगों को यह संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति के सामने अग्नि की लपटें भी झुक जाती हैं।



