
दुनियाभर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन की समस्याओं के कारण ईंधन संकट गहराता जा रहा है। इसका असर खास तौर पर एशियाई देशों पर पड़ रहा है, जहां ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत करीब 9 एशियाई देश इस संकट से निपटने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपना रहे हैं ताकि आम लोगों और उद्योगों पर इसका असर कम से कम पड़े।
भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। सरकार कच्चे तेल के आयात के स्रोतों में विविधता ला रही है और रूस, मध्य एशिया तथा अफ्रीकी देशों से तेल खरीद बढ़ा रही है। इसके साथ ही भारत अक्षय ऊर्जा पर भी तेजी से काम कर रहा है। सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देने के साथ-साथ इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जिससे पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम हो सके।
वहीं पाकिस्तान ईंधन संकट से निपटने के लिए ऊर्जा बचत के उपायों पर जोर दे रहा है। वहां सरकार ने सरकारी कार्यालयों और बाजारों के समय में बदलाव किया है ताकि बिजली और ईंधन की खपत कम हो सके। इसके अलावा पाकिस्तान एलएनजी और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खरीद बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
बांग्लादेश ने भी ईंधन संकट को देखते हुए बिजली उत्पादन में विविधता लाने की योजना बनाई है। सरकार कोयला और गैस आधारित बिजली संयंत्रों के साथ-साथ सौर ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही है। इसके अलावा ऊर्जा आयात के लिए नए अंतरराष्ट्रीय समझौते किए जा रहे हैं, जिससे भविष्य में ईंधन की कमी न हो।
इन तीन देशों के अलावा श्रीलंका, नेपाल, थाईलैंड, वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया भी ऊर्जा संकट से निपटने के लिए कदम उठा रहे हैं। कई देश ऊर्जा सब्सिडी में बदलाव कर रहे हैं, जबकि कुछ देश सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देकर निजी वाहनों के इस्तेमाल को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एशियाई देश ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों, क्षेत्रीय सहयोग और ऊर्जा दक्षता पर ध्यान दें तो ईंधन संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आने वाले समय में स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा ही इस समस्या का सबसे स्थायी समाधान मानी जा रही है।



