अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की उप-प्रथम प्रबंध निदेशक गीता गोपीनाथ ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है। यह फैसला वैश्विक अर्थव्यवस्था और नीतिगत चुनौतियों के बीच एक अहम मोड़ पर आया है। गीता गोपीनाथ, जो कि IMF में दूसरे सर्वोच्च पद पर थीं, अब एक बार फिर से शैक्षणिक क्षेत्र में वापसी करने जा रही हैं। वे अमेरिका की प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के रूप में अपनी पुरानी भूमिका में लौटेंगी।
गीता गोपीनाथ भारतीय मूल की प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री हैं, जिन्होंने IMF में रहते हुए कई महत्वपूर्ण आर्थिक नीतियों के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौर में उनकी आर्थिक सूझबूझ और नीति-निर्माण में भागीदारी को दुनिया भर में सराहा गया। उन्होंने वैश्विक रिकवरी, मुद्रास्फीति, ऋण संकट और जलवायु परिवर्तन जैसे जटिल विषयों पर स्पष्ट विचार प्रस्तुत किए।
उनके इस्तीफे की पुष्टि IMF की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने करते हुए कहा कि, “गीता न केवल एक अद्भुत अर्थशास्त्री हैं, बल्कि एक मजबूत लीडर भी हैं। उनकी विदाई IMF के लिए एक बड़ी क्षति है, लेकिन शिक्षा जगत के लिए यह एक सौगात है।”
गीता गोपीनाथ ने अपने बयान में कहा कि वह शिक्षा के क्षेत्र में फिर से योगदान देना चाहती हैं और हार्वर्ड की कक्षा में वापस लौटना उनके लिए भावनात्मक और व्यावसायिक दोनों रूप से एक स्वाभाविक कदम है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि IMF में काम करते हुए उन्होंने जो अनुभव और दृष्टिकोण पाया, वह उन्हें भविष्य की पीढ़ियों को सिखाने में मदद करेगा।
उनके इस निर्णय को दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं ने सम्मानपूर्वक स्वीकार किया है। भारत सहित कई देशों में उनके इस्तीफे को लेकर चर्चा चल रही है, क्योंकि वह भारतीय मूल की उन गिनी-चुनी महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने वैश्विक स्तर पर आर्थिक नीति-निर्माण में अपनी जगह बनाई।
गीता गोपीनाथ का यह कदम एक याद दिलाता है कि नीति निर्माण और शिक्षण, दोनों ही एक देश और दुनिया के भविष्य को आकार देने में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।



