
तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं ने दक्षिण एशियाई कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। खासतौर पर भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को लेकर नीति विशेषज्ञों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नई सरकार किस दिशा में आगे बढ़ेगी। पिछले डेढ़ दशक में दोनों देशों के बीच सुरक्षा, कनेक्टिविटी, ऊर्जा, व्यापार और सीमा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या नया नेतृत्व इन उपलब्धियों को जारी रखेगा या विदेश नीति की प्राथमिकताओं में बदलाव देखने को मिलेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि ढाका की किसी भी सरकार के लिए नई दिल्ली के साथ सहयोग बनाए रखना व्यावहारिक आवश्यकता है। सीमा साझा करने, ट्रांजिट, नदी जल बंटवारे और पूर्वोत्तर भारत से जुड़े भू-रणनीतिक पहलुओं के कारण दोनों देश एक-दूसरे पर काफी हद तक निर्भर हैं। हालांकि, घरेलू राजनीति में अक्सर भारत को लेकर बयानबाजी भी देखने को मिलती है, जिसका असर द्विपक्षीय माहौल पर पड़ सकता है।
इसी बीच पाकिस्तान और चीन के साथ संभावित समीकरणों को लेकर भी चर्चा तेज है। माना जा रहा है कि अगर नई सरकार क्षेत्रीय संतुलन की नीति अपनाती है, तो वह बीजिंग से निवेश और बुनियादी ढांचा सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर सकती है, जबकि इस्लामाबाद के साथ रिश्तों में प्रतीकात्मक गर्मजोशी दिखाई दे सकती है। लेकिन सुरक्षा और आर्थिक हितों को देखते हुए भारत से दूरी बनाना आसान नहीं होगा।
रणनीतिक मामलों के जानकार यह भी कहते हैं कि व्यापार और विकास की जरूरतें अंततः व्यवहारिक कूटनीति को ही बढ़ावा देती हैं। बांग्लादेश के निर्यात, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं में भारत की भूमिका अहम है। यही वजह है कि नई दिल्ली भी किसी भी राजनीतिक परिवर्तन के बावजूद साझेदारी बनाए रखने की कोशिश करेगी।
कुल मिलाकर, यदि तारिक रहमान सत्ता में आते हैं तो शुरुआती महीनों में बयानबाजी और संकेतों का दौर जरूर चलेगा, लेकिन लंबे समय में रिश्तों की दिशा वही तय करेगी जो दोनों देशों के साझा हितों के अनुकूल होगी। दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए भी यही रास्ता सबसे व्यावहारिक माना जा रहा है।



