
मध्य पूर्व की राजनीति और सुरक्षा समीकरणों में Hezbollah एक बेहद अहम और प्रभावशाली नाम बन चुका है। लेबनान में सक्रिय यह संगठन शुरुआत में एक “रिवोल्यूशनरी गार्ड” की तरह उभरा था, जिसे Iran का मजबूत समर्थन प्राप्त था। समय के साथ यह संगठन न केवल लेबनान की राजनीति में प्रभावी हुआ, बल्कि Israel के लिए भी एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बन गया।
हिजबुल्ला की स्थापना 1980 के दशक में हुई थी, जब लेबनान गृहयुद्ध और बाहरी हस्तक्षेपों से जूझ रहा था। उस समय Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने शिया समुदाय के बीच एक संगठित ताकत तैयार करने में मदद की। इसका उद्देश्य इजरायल के खिलाफ प्रतिरोध खड़ा करना और लेबनान में प्रभाव बढ़ाना था।
शुरुआत में हिजबुल्ला एक छोटे मिलिटेंट समूह के रूप में उभरा, लेकिन धीरे-धीरे यह एक शक्तिशाली संगठन बन गया। आज यह न केवल एक सशस्त्र समूह है, बल्कि लेबनान की राजनीति में भी इसकी महत्वपूर्ण भागीदारी है। इसके पास अपनी सैन्य क्षमता, सामाजिक सेवाएं और राजनीतिक नेटवर्क है, जिससे इसकी पकड़ मजबूत बनी हुई है।
इजरायल के साथ हिजबुल्ला का संघर्ष लंबे समय से जारी है। खासकर 2006 का Lebanon War 2006 दोनों के बीच तनाव का बड़ा उदाहरण रहा है। इस युद्ध के बाद हिजबुल्ला ने अपनी सैन्य ताकत को और बढ़ाया और आधुनिक हथियारों से खुद को लैस किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान से मिलने वाली वित्तीय और सैन्य सहायता हिजबुल्ला की ताकत का सबसे बड़ा स्रोत है। यही कारण है कि यह संगठन इजरायल के लिए लगातार चुनौती बना हुआ है। हाल के वर्षों में हिजबुल्ला ने मिसाइल क्षमता और ड्रोन तकनीक में भी सुधार किया है, जिससे उसकी मारक क्षमता और बढ़ गई है।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच हिजबुल्ला की गतिविधियां और भी बढ़ गई हैं। इजरायल को उत्तरी सीमा पर लगातार सतर्क रहना पड़ता है, क्योंकि किसी भी समय संघर्ष की स्थिति बन सकती है।
हालांकि, हिजबुल्ला को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मतभेद हैं। कुछ देश इसे आतंकवादी संगठन मानते हैं, जबकि कुछ इसे राजनीतिक और सामाजिक संगठन के रूप में भी देखते हैं।
कुल मिलाकर, ईरान के समर्थन से बना हिजबुल्ला आज मध्य पूर्व की राजनीति का एक अहम खिलाड़ी बन चुका है, जो इजरायल के लिए लगातार चुनौती पैदा कर रहा है और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर रहा है।



