
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना को 100 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, और इस अवसर पर 2025 में एक विशाल शताब्दी समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इस समारोह को लेकर देश-विदेश में विशेष चर्चा हो रही है, लेकिन एक खास बात जिसने सबका ध्यान खींचा है, वह यह कि पाकिस्तान, तुर्किये और बांग्लादेश जैसे देशों को इस समारोह के लिए न्योता नहीं भेजा गया है।
सूत्रों के अनुसार, आरएसएस ने इस ऐतिहासिक समारोह में भाग लेने के लिए विश्व के कई देशों से सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों, हिंदू प्रतिनिधियों और विचारकों को आमंत्रित किया है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान, नेपाल, मॉरीशस, श्रीलंका, थाईलैंड, और कई यूरोपीय देशों को आमंत्रण दिया गया है। लेकिन तीन पड़ोसी देशों—पाकिस्तान, तुर्किये और बांग्लादेश — को इस सूची से बाहर रखा गया है।
❖ कारण क्या हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि इन देशों के साथ भारत और आरएसएस के वैचारिक एवं कूटनीतिक मतभेद इसकी प्रमुख वजह हो सकते हैं।
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पाकिस्तान: लंबे समय से आरएसएस और पाकिस्तान के बीच वैचारिक दूरी रही है। संघ को पाकिस्तान के कट्टर इस्लामी रुख और भारत विरोधी नीतियों से सैद्धांतिक असहमति है।
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तुर्किये: हाल के वर्षों में तुर्किये की सरकार ने कश्मीर मुद्दे और भारत के आंतरिक मामलों में जिस तरह से बयानबाज़ी की है, वह संघ की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं मानी जाती।
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बांग्लादेश: भले ही भारत-बांग्लादेश के राजनीतिक रिश्ते मजबूत रहे हों, लेकिन बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों और कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियों पर संघ लगातार चिंता जताता रहा है।
❖ राजनीतिक और वैचारिक संदेश
RSS का यह कदम केवल एक संगठनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और वैचारिक संदेश भी है। यह दिखाता है कि संघ सिर्फ सांस्कृतिक संगठन ही नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के सिद्धांतों पर अडिग संगठन है जो अपने मूल्यों से समझौता नहीं करता, चाहे वह अंतरराष्ट्रीय संबंधों की कीमत पर ही क्यों न हो।
इस निर्णय को लेकर कई विश्लेषक यह भी मान रहे हैं कि यह केंद्र सरकार की विदेश नीति पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि RSS को भारतीय राजनीति में एक सांस्कृतिक रीढ़ माना जाता है।
❖ विरोध और समर्थन
हालांकि कुछ वर्ग इस कदम को वैचारिक कट्टरता मानकर इसकी आलोचना कर रहे हैं, वहीं संघ समर्थकों का मानना है कि यह एक साहसिक और स्पष्ट रुख है, जो यह बताता है कि राष्ट्रीय सम्मान और सिद्धांतों के आगे कोई आमंत्रण या संबंध मायने नहीं रखते।
निष्कर्ष:
RSS के इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शताब्दी समारोह सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि एक वैचारिक मंच है, जहां वही आमंत्रित होंगे जो संघ के मूल्यों, संस्कृति और राष्ट्रभाव का सम्मान करते हैं। पाकिस्तान, तुर्किये और बांग्लादेश को न बुलाना केवल एक कार्यक्रमिक निर्णय नहीं, बल्कि संघ की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं का आईना है।



