UP BJP के क्षेत्रीय अध्यक्ष चयन में जातीय गणित, काशी की धुरी से सपा के PDA को भेदने की तैयारी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से अहम भूमिका निभाते रहे हैं। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी ने अब पूर्वांचल खासकर काशी क्षेत्र में एक नया राजनीतिक दांव खेलने की तैयारी की है। पार्टी का लक्ष्य समाजवादी पार्टी के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को चुनौती देना है। इसके लिए भाजपा काशी क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष के चयन में जातीय संतुलन पर विशेष ध्यान दे रही है, ताकि सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में किया जा सके।
समाजवादी पार्टी के मुखिया Akhilesh Yadav ने हाल के वर्षों में PDA फार्मूले को आगे बढ़ाकर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को एकजुट करने की रणनीति बनाई है। इस रणनीति को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी भी अब अपने संगठनात्मक ढांचे में ऐसे चेहरों को आगे लाने की कोशिश कर रही है जो विभिन्न सामाजिक वर्गों में प्रभाव रखते हों। काशी क्षेत्र का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह पूर्वांचल की राजनीति का केंद्र माना जाता है।
भाजपा नेतृत्व का मानना है कि यदि काशी क्षेत्र में मजबूत सामाजिक संतुलन के साथ संगठन को मजबूती दी जाती है, तो इसका असर आसपास के कई जिलों में भी दिखाई देगा। इसी वजह से क्षेत्रीय अध्यक्ष के चयन में ऐसी जातीय और सामाजिक पृष्ठभूमि वाले नेता पर विचार किया जा रहा है जो पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक के साथ-साथ नए वर्गों को भी जोड़ सके।
पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि काशी क्षेत्र में संगठन को और मजबूत बनाकर आगामी चुनावों में बड़ा राजनीतिक संदेश दिया जा सकता है। भाजपा का लक्ष्य यह भी है कि सपा के PDA समीकरण को उसी के सामाजिक आधार में चुनौती दी जाए। इसके लिए संगठन में नए नेतृत्व को मौका देकर सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की रणनीति बनाई जा रही है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार भाजपा की यह रणनीति सिर्फ संगठनात्मक बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर आने वाले चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है। यदि भाजपा काशी क्षेत्र में अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने में सफल रहती है, तो यह समाजवादी पार्टी के PDA फार्मूले के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा का यह जातीय गणित उत्तर प्रदेश की राजनीति में किस तरह के परिणाम लेकर आता है।



