
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में सावरकर को भारत रत्न देने की मांग पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एक संवेदनशील विषय है और इसे लेकर लोगों के अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। भागवत ने कहा कि “मिलूंगा तो मैं पूछूंगा कि…” इस तरह की स्थिति में, वह इस विषय पर गहराई से विचार करेंगे और तथ्यों के आधार पर निर्णय करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि सावरकर के योगदान और उनके विचारों का मूल्यांकन करना जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बिना व्यापक चर्चा के कोई फैसला लिया जाए।
मोहन भागवत ने यह संदेश भी दिया कि इतिहास और राष्ट्रहित को समझते हुए किसी भी व्यक्ति को सम्मान देने का निर्णय सोच-समझकर लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वीर सावरकर के योगदान पर अनेक मत हैं, और समाज के सभी वर्गों की भावनाओं का सम्मान करना आवश्यक है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि इस तरह के सम्मानात्मक पुरस्कार केवल किसी की लोकप्रियता या राजनीतिक दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक योगदान, विचारधारा और राष्ट्र सेवा के आधार पर दिए जाने चाहिए।
भागवत ने यह भी संकेत दिया कि सावरकर के भारत रत्न के लिए नामांकन की प्रक्रिया में सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर किसी तरह की आलोचना या विरोध है, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और इसे सार्वजनिक बहस के जरिए हल किया जाना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने इतिहासकारों और विद्वानों की राय को भी महत्व देने की आवश्यकता पर बल दिया।
इस बयान के बाद सावरकर को भारत रत्न देने की मांग पर नई बहस छिड़ गई है। कई लोग इसे सही मानते हैं, तो कुछ इसके खिलाफ हैं। मोहन भागवत ने इस चर्चा को संतुलित और तथ्यपरक बनाए रखने पर जोर दिया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि किसी भी सम्मान या पुरस्कार को राजनीतिक दांव-पेंच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
संक्षेप में, मोहन भागवत ने सावरकर को भारत रत्न देने के मामले में सावधानी और विचारशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनका कहना है कि देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए निर्णय केवल व्यक्तिगत विचारों पर नहीं, बल्कि राष्ट्रहित और व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए लिया जाना चाहिए।



