
अमेरिका द्वारा G20 शिखर सम्मेलन 2026 से दक्षिण अफ्रीका (SA) को बाहर किए जाने के फैसले ने वैश्विक राजनीति में नया भूचाल ला दिया है। खास तौर पर, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की नाराज़गी ने मामले को और भी गंभीर बना दिया है। ट्रम्प ने इस कदम को “अनुचित”, “कूटनीतिक गलती” और “अंतरराष्ट्रीय संतुलन के खिलाफ” बताया है। उनकी नाराज़गी के कई कारण हैं, जिनमें राजनीतिक, आर्थिक और व्यक्तिगत रणनीतिक हित प्रमुख माने जा रहे हैं।
सबसे पहले, दक्षिण अफ्रीका BRICS समूह का एक महत्वपूर्ण सदस्य है और हाल के वर्षों में उसने रूस और चीन के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं। अमेरिका का मानना है कि SA की नीतियां पश्चिमी देशों की रणनीतिक दिशा से मेल नहीं खातीं, जिसके चलते उसे G20 से अलग रखना उचित कदम माना गया। लेकिन ट्रम्प की सोच अलग है। ट्रम्प मानते हैं कि अमेरिका चाहे तो कूटनीतिक संवाद के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका को अपने पाले में रख सकता था, बजाय उसे बाहर करने जैसे कठोर कदम उठाने के।
दूसरा बड़ा कारण घरेलू राजनीति है। ट्रम्प आगामी चुनावों में खुद को एक मजबूत वैश्विक नेता के रूप में पेश करने की कोशिश में हैं। वे इस विवाद को बतौर मुद्दा इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि वे दिखा सकें कि मौजूदा अमेरिकी प्रशासन अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को संभालने में “असफल” है। उनका कहना है कि इस कदम से अफ्रीकी देशों में अमेरिका के प्रति अविश्वास बढ़ेगा और चीन को नए अवसर मिलेंगे।
तीसरा कारण आर्थिक है। दक्षिण अफ्रीका अफ्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और अमेरिका के लिए रणनीतिक व्यापार साझेदार भी। ट्रम्प का दावा है कि SA को बाहर करना अमेरिका के दीर्घकालिक व्यापारिक हितों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इस निर्णय के कारण अफ्रीका में अमेरिकी प्रभाव कमजोर पड़ सकता है और वहां चीन और रूस अपना दखल और बढ़ा सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम को वैश्विक शक्ति संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। वे कहते हैं कि G20 जैसे मंच से किसी देश को बाहर करना केवल कूटनीति नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन भी होता है। ट्रम्प का विरोध इसी शक्ति संतुलन की राजनीति को लेकर है। उनका तर्क है कि अमेरिका को वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने के लिए सहयोग और संवाद की नीति अपनानी चाहिए, न कि बहिष्कार की।



