
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने बेबाक और विवादित बयानों को लेकर सुर्खियों में हैं। उन्होंने दावा किया है कि चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देश अमेरिका से डरते हैं और यही वजह है कि उनके कार्यकाल के दौरान वैश्विक स्तर पर कई बड़े संघर्ष भड़कने से बचे रहे। ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर वे सत्ता में होते तो दुनिया में कम से कम आठ बड़े युद्ध या तो शुरू ही नहीं होते या उन्हें खत्म करा दिया जाता। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-हमास संघर्ष और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति पहले से ही तनावपूर्ण बनी हुई है। ट्रंप का मानना है कि अमेरिका की मजबूत सैन्य शक्ति और आक्रामक कूटनीति ही वैश्विक शांति की कुंजी है, और उनके नेतृत्व में दुश्मन देश सीधे टकराव से बचते थे। हालांकि आलोचकों का कहना है कि ट्रंप का यह ‘अलापा राग’ चुनावी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वे खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं जो युद्ध रोक सकता है, न कि भड़का सकता है। विशेषज्ञों का तर्क है कि चीन और रूस की विदेश नीति केवल डर पर आधारित नहीं है, बल्कि उनके अपने रणनीतिक, आर्थिक और क्षेत्रीय हित हैं, जिन्हें वे किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति के आने-जाने से ऊपर रखते हैं। इसके बावजूद ट्रंप समर्थक यह मानते हैं कि उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने दुनिया को यह संदेश दिया था कि अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ट्रंप का यह दावा भी चर्चा में है कि वर्तमान वैश्विक अशांति कमजोर नेतृत्व का परिणाम है और अगर सख्त रुख अपनाया जाए तो हालात काबू में आ सकते हैं। कुल मिलाकर, ट्रंप का यह बयान न केवल अमेरिका की आंतरिक राजनीति में हलचल पैदा करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी यह सवाल खड़ा करता है कि क्या वास्तव में ताकत का प्रदर्शन ही शांति का रास्ता है, या फिर संवाद और बहुपक्षीय सहयोग ही स्थायी समाधान दे सकता है।



