
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और बयानों का असर एक बार फिर वैश्विक नौकरी बाजार पर दिखाई देने लगा है। खासकर भारतीय प्रोफेशनल्स और छात्रों के लिए अमेरिका जाने का रास्ता पहले से अधिक कठिन होता जा रहा है। ट्रंप प्रशासन के दौरान “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत इमिग्रेशन नियमों को सख्त किया गया था, जिसका सीधा असर H-1B वीज़ा, वर्क परमिट और ग्रीन कार्ड प्रक्रियाओं पर पड़ा। अब ट्रंप की संभावित वापसी या उनके प्रभाव से जुड़े संकेतों ने भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, इंजीनियर्स, हेल्थकेयर वर्कर्स और स्टूडेंट्स के बीच चिंता बढ़ा दी है।
सबसे बड़ा संकट H-1B वीज़ा पर निर्भर भारतीयों के सामने है। अमेरिकी कंपनियों में काम कर रहे हजारों भारतीय कर्मचारियों को वीज़ा रिन्यूअल, ट्रांसफर और स्थायी निवास को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। कई मामलों में कंपनियां नई भर्तियों से बच रही हैं या भारतीय कर्मचारियों को ऑनसाइट भेजने की योजनाएं टाल दी गई हैं। इससे न केवल करियर ग्रोथ रुकी है, बल्कि कई लोगों की नौकरी पर भी खतरा मंडरा रहा है।
छात्रों के लिए भी स्थिति आसान नहीं है। OPT और CPT जैसे वर्क ऑप्शंस पर सख्ती की आशंका से अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ रहे भारतीय छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है। पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में काम करने की उम्मीद रखने वाले छात्रों को अब अन्य देशों की ओर रुख करना पड़ सकता है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप जैसे विकल्पों की ओर भारतीय युवाओं का झुकाव बढ़ रहा है।
इसके अलावा, इमिग्रेशन प्रक्रिया में देरी, सख्त इंटरव्यू और बढ़ती अस्वीकृतियों ने परिवारों को भी प्रभावित किया है। कई लोग अमेरिका में रह रहे अपने परिवार से मिलने तक नहीं जा पा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नीतियों में और सख्ती आई, तो इसका असर अमेरिकी कंपनियों पर भी पड़ेगा, क्योंकि भारतीय टैलेंट टेक्नोलॉजी और हेल्थकेयर सेक्टर की रीढ़ माना जाता है।
कुल मिलाकर, ट्रंप फैक्टर ने भारतीयों के अमेरिकी सपने को एक बार फिर चुनौतीपूर्ण बना दिया है। आने वाले समय में नीति की दिशा क्या होगी, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल अनिश्चितता और चिंता का माहौल साफ तौर पर देखा जा सकता है।



