
भारत में उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति भी होते हैं। ऐसे में उपराष्ट्रपति चुनाव हमेशा राजनीतिक दलों की ताकत और संसदीय समीकरणों को सामने लाता है। इस बार होने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव में भी सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सत्ता पक्ष यानी एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) का पलड़ा कितना भारी है और विपक्ष की स्थिति क्या है।
चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा के सांसद मिलकर करते हैं। इस समय लोकसभा में एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत है। भाजपा अकेले ही 290 से ज्यादा सांसदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है। वहीं एनडीए के सहयोगी दलों को जोड़कर यह संख्या और भी मजबूत हो जाती है। राज्यसभा में भी एनडीए का प्रभाव काफी बढ़ा है, हालांकि वहां विपक्ष के पास भी कुछ मजबूती है।
अगर आंकड़ों पर गौर करें तो कुल मिलाकर एनडीए उम्मीदवार की जीत लगभग तय मानी जा रही है। लोकसभा में जहां विपक्षी दलों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, वहीं राज्यसभा में भले ही मुकाबला थोड़ा दिलचस्प हो, लेकिन संयुक्त रूप से देखा जाए तो एनडीए के पास बहुमत का मजबूत आधार है। यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि उपराष्ट्रपति पद की कुर्सी पर एनडीए का कब्जा लगभग सुनिश्चित है।
विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया ब्लॉक’ ने भी इस चुनाव में एक साझा उम्मीदवार उतारने की तैयारी की है, ताकि एनडीए को कड़ी टक्कर दी जा सके। हालांकि, विपक्ष के पास न तो पर्याप्त संख्या है और न ही सभी दलों में पूरी तरह से एकजुटता। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे प्रतीकात्मक चुनाव मान रहे हैं, जिसमें विपक्ष अपने मतदाताओं और समर्थकों के बीच यह संदेश देना चाहता है कि वह लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 न केवल एनडीए की ताकत का प्रदर्शन करेगा, बल्कि यह विपक्ष की एकजुटता की परीक्षा भी बनेगा। यदि विपक्षी उम्मीदवार को अपेक्षा से ज्यादा वोट मिलते हैं तो यह भविष्य की राजनीति के लिए संकेत हो सकता है। लेकिन वर्तमान स्थिति और आंकड़े यही कहते हैं कि एनडीए का पलड़ा भारी है और उपराष्ट्रपति पद पर उसका उम्मीदवार काबिज होने वाला है।



