
दुनिया की दिग्गज एयरोस्पेस कंपनी Airbus इन दिनों अमेरिका के CLOUD एक्ट (Clarifying Lawful Overseas Use of Data Act) को लेकर गहरी चिंता में है। इसी वजह से कंपनी ने गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी अमेरिकी टेक कंपनियों से दूरी बनानी शुरू कर दी है। सवाल यह है कि आखिर CLOUD एक्ट ऐसा क्या है, जिससे यूरोपीय कंपनियों की नींद उड़ गई है। दरअसल, यह कानून अमेरिकी सरकार को यह अधिकार देता है कि वह अमेरिका आधारित टेक कंपनियों से दुनिया के किसी भी कोने में स्टोर किया गया डेटा मांग सकती है, भले ही वह डेटा किसी अन्य देश के सर्वर पर क्यों न हो। यही प्रावधान Airbus जैसी कंपनियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है। Airbus रक्षा, एयरोस्पेस और संवेदनशील औद्योगिक तकनीक से जुड़ी कंपनी है, जहां डेटा की गोपनीयता और संप्रभुता (Data Sovereignty) सर्वोपरि मानी जाती है। कंपनी को डर है कि अगर उसका संवेदनशील डेटा अमेरिकी क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर्स के पास रहता है, तो किसी कानूनी आदेश के तहत वह डेटा अमेरिकी एजेंसियों तक पहुंच सकता है। इससे न सिर्फ कारोबारी रहस्य उजागर होने का खतरा है, बल्कि यूरोपीय संघ के सख्त डेटा प्रोटेक्शन कानूनों, जैसे GDPR, का उल्लंघन भी हो सकता है। Airbus की चिंता केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है, क्योंकि रक्षा और सुरक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट्स में डेटा लीक होना राष्ट्रीय सुरक्षा तक को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण Airbus अब यूरोपीय या संप्रभु क्लाउड समाधानों पर ज्यादा भरोसा दिखा रहा है और अमेरिकी टेक दिग्गजों पर निर्भरता कम कर रहा है। यह कदम यूरोप में डिजिटल संप्रभुता की बहस को भी तेज करता है, जहां लंबे समय से यह मांग उठ रही है कि यूरोपीय कंपनियों का डेटा यूरोप के कानूनों के दायरे में ही सुरक्षित रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सिर्फ Airbus ही नहीं, बल्कि अन्य बड़ी यूरोपीय कंपनियां भी CLOUD एक्ट जैसे कानूनों के चलते अमेरिकी क्लाउड सेवाओं से दूरी बना सकती हैं। इससे वैश्विक टेक इंडस्ट्री में नए क्लाउड इकोसिस्टम और क्षेत्रीय विकल्पों को बढ़ावा मिल सकता है। कुल मिलाकर, Airbus का यह फैसला यह साफ संकेत देता है कि अब कंपनियां केवल तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि डेटा सुरक्षा, कानूनी नियंत्रण और डिजिटल संप्रभुता को प्राथमिकता दे रही हैं।



