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विलय का मतलब वफ़ा…इसलिए अखिलेश और शिवपाल के बीच गठबंधन का रिश्ता!

“प्रसपा (प्रगतिशील समाजवादी पार्टी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाक़ात और गठबंधन पर बात” ये अखिलेश यादव का ट्वीट है. जवाब में चाचा शिवपाल का ट्वीट आया- समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी से आवास पर शिष्टाचार भेंट. ये शिष्टाचार बना रहे, संबंधों की शालीनता यूं ही बरक़रार रहे. चाचा-भतीजे के बीच सियासी संग्राम की सभी संभावनाएं समाप्त हो जाएं और भविष्य में राजनीतिक विरासत को लेकर घर में घमासान की किसी भी गुंजाइश को घुसने तक का मौक़ा ना मिले. ये दोनों ट्वीट इसी बात की गवाही दे रहे हैं. क्योंकि अक्टूबर 2016 का वो पूरा सीन धुंधली यादों, तल्ख़ी भरे अंदाज़, कार्यकर्ताओं के सामने मंच पर माइक छीनने का वो वीडियो और चाचा शिवपाल के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश की वो जंग सबकुछ ऑनलाइन उपलब्ध है.

जब-जब अखिलेश और शिवपाल को लेकर चर्चा होगी, तब-तब वो सब याद आएगा, जिसकी वजह से समाजवादी पार्टी दो हिस्सों में बंट गई. अखिलेश कह सकते हैं कि असली समाजवादी पार्टी वही है, जिसके वो अध्यक्ष हैं, जबकि शिवपाल ये कहकर अलग हुए थे कि उन्होंने भी समाजवादी पार्टी के लिए उतना ही समर्पण, त्याग और संघर्ष किया है, जितना अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव ने. बहरहाल अब आपको ये बताते हैं कि भतीजे अखिलेश यादव ने 2016 के राजनीतिक विवाद के बाद पहली बार चाचा शिवपाल यादव के घर का रुख़ क्यों किया? और किया तो बात सिर्फ़ दल मिलने तक ही क्यों रह गई है, दिल मिलने की नौबत क्यों नहीं आई?

ना अखिलेश सत्ता में वापसी कर सके और ना शिवपाल यादव की पार्टी मज़बूत राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी

अखिलेश और शिवपाल के बीच इस ‘चुनावी शिष्टाचार’ के मायनों पर ग़ौर करना बहुत दिलचस्प है. ज़रा याद कीजिए, वो दौर जब मुलायम सिंह ने अक्टूबर 2016 से लेकर 2017 के शुरुआती दिनों तक कई-कई बार शिवपाल यादव से मिलकर उन्हें मनाने की कोशिशें की. शिवपाल नहीं माने, क्योंकि वो मुलायम सिंह के बाद समाजवादी सियासत की विरासत को अखिलेश के हाथों में जाते हुए देख रहे थे. वो चाहते थे कि पार्टी की कमान मुलायम सिंह के बाद उन्हें मिले, लेकिन इसके लिए खुले तौर पर अखिलेश तैयार नहीं थे और अंदरूनी तौर पर मुलायम भी नहीं चाहते थे.

फिर भी उन्होंने शिवपाल को अखिलेश का हमसाया बनाए रखने की पुरज़ोर नाकाम कोशिश करके देख ली. तब से अब तक यूपी समेत देश की राजनीति में बहुत कुछ घटा. फिर भी अखिलेश अपनी जगह कायम रहे और शिवपाल ख़ुद को प्रसपा के बैनर तले कामयाब बनाने के लिए हर दांव-पेंच आजमाते रहे. ना अखिलेश सत्ता में वापसी कर सके और ना शिवपाल यादव की पार्टी मज़बूत राजनीतिक पार्टी बनकर उभर सकी.

वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है!

ग़ौर करने वाली बात ये है कि अखिलेश और शिवपाल 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भिड़ गए थे. दोनों ने ख़ुद को समाजवादी पार्टी का असली दावेदार बताने और पार्टी के वोटबैंक का असली उत्तराधिकारी जताने के लिए चुनावी कसौटी पर रखकर देखा. नतीजा ये हुआ कि उस चुनाव से पहले बिछड़े चाचा-भतीजे को इस बार के चुनाव से ठीक पहले मिलना पड़ा. 2017 के बाद से अखिलेश यादव ने पार्टी को मज़बूत करने के लिए हरस्तर पर कोशिशें की. लेकिन, जब-जब राजनीतिक रिश्तों और गठबंधन के सहयोगियों को लेकर बातचीत होती थी. तब-तब अखिलेश यादव के सामने चाचा शिवपाल को लेकर सवाल ज़रूर गूंजते.

2017 के चुनाव से ठीक पहले शिवपाल के पास समय बहुत कम था. वो शुरुआती लड़ाई इस आधार पर लड़ते रहे कि समाजवादी पार्टी पर हक़ जताना है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. शिवपाल इस राजनीतिक हैसियत में भी नहीं थे कि अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी का बड़ा नुक़सान कर पाते. लेकिन पार्टी को अंदरूनी तौर पर बड़ा नुक़सान हुआ. 2012 में 224 सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी 2017 में 47 सीटों पर सिमटकर रह गई. भतीजे के हाथ से सत्ता चली गई. चाचा को दूसरी पार्टी बनानी पड़ी. अब दोनों एक बार फिर एक मंच पर हैं. सत्ता विरोधी विपक्ष के मंच पर.

मिलकर चुनाव लड़ेंगे, विलय नहीं करेंगे!

अखिलेश यादव ने वो राजनीतिक प्रोटोकॉल निभाया, जिसकी चर्चा मुलायम सिंह कई महीनों से कर रहे थे. शिवपाल ने उस प्रोटोकॉल की लाज रखी, जिसकी चर्चा वो अपनी हाल की चुनावी यात्राओं में कर रहे थे. उन्होंने अखिलेश यादव के जिन्ना वाले बयान से लगातार अपना दामन बचाए रखा, लेकिन हर बार भतीजे के साथ गठबंधन के सवाल पर कहते भी रहे कि “उनको आना चाहिए”. अखिलेश ने उनकी बात सुनी और चाचा के घर आए. अब मुद्दे की बात है अखिलेश का पहला ट्वीट- प्रसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी से मुलाक़ात हुई और गठबंधन की बात तय हुई. क्षेत्रीय दलों को साथ लेने की नीति सपा को निरंतर मज़बूत कर रही है और सपा और अन्य सहयोगियों को ऐतिहासिक जीत की ओर ले जा रही है“.

इसके कुछ देर बाद शिवपाल यादव का ट्वीट आया- आज समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी ने आवास पर शिष्टाचार भेंट की. इस दौरान उनके साथ आगामी विधान सभा चुनाव 2022 में साथ मिलकर चुनाव लड़ने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई”. दोनों के मन में कुछ भी हो, लेकिन दोनों के ट्वीट के मायने एक हैं. अखिलेश यादव की सपा और शिवपाल यादव की प्रसपा के बीच विलय नहीं होगा. फ़िलहाल तो बिल्कुल नहीं.

2016 की जंग नहीं दोहराना चाहते अखिलेश!

अखिलेश ने गठबंधन की बात सोशल मीडिया पर कहकर ये प्रचारित कर दिया है कि चाचा की पार्टी उनके लिए वैसा ही क्षेत्रीय दल है, जैसे बाक़ी कई और दलों के साथ वो गठबंधन कर चुके हैं या करने की संभावनाएं हैं. वहीं, दूसरी तरफ़ शिवपाल यादव के पास अब गठबंधन के सिवा विलय का कोई चारा नहीं बचा है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि अखिलेश नहीं चाहते कि घर से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने मंच पर 2016 में जो महाभारत हुई थी, वो अब भविष्य में कभी ना दोहराई जा सके. अगर शिवपाल की पार्टी का विलय समाजवादी पार्टी में हो गया, तो अखिलेश के सामने इस बात का ख़तरा हमेशा बना रहेगा कि वो या तो चाचा शिवपाल की बात मानें या फिर उनका विरोध झेलें.

और राजनीति में ऐसा हो नहीं सकता कि महत्वाकांक्षाएं सीमित हो सकें. जब जिसका दांव भारी पड़ेगा, तब-तब वो अपना स्वामित्व जताने की कोशिश करेगा. समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष पद पाने के लिए अखिलेश यादव को पार्टी से चाचा शिवपाल को खोना पड़ा था. वो इस बिखराव की क़ीमत पहले ही अदा कर चुके हैं, इसलिए भविष्य में ऐसा कोई भी संभावित संकट नहीं चाहते. जबकि शिवपाल के पास राजनीतिक तौर पर खोने के लिए कुछ नहीं है. अपनी चुनावी रथयात्राओं में वो बार-बार कहते रहे हैं कि समाजवादी आंगन में एक बार फिर वो जड़ समेत जुड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन अखिलेश को चाचा के ज़्यादा क़रीब आने में शायद संकट नजर आ रहा है. इसलिए, वो चाचा के साथ सिर्फ़ गठबंधन वाली दोस्ती निभाने के लिए तैयार हैं, क्योंकि ऐसे सियासी रिश्तों में वफ़ा की उम्मीद कम ही होती है.

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