सुब्रह्मण्य षष्ठी 2025: कैसे करें भगवान कार्तिकेय की पूजा? जानें सम्पूर्ण पूजा-विधि व महत्व

सुब्रह्मण्य षष्ठी, जिसे स्कंद षष्ठी या कार्तिकेय षष्ठी भी कहा जाता है, भगवान शिव के वीर पुत्र कार्तिकेय (मुरुगन/स्कंद/सुब्रह्मण्य) को समर्पित एक अत्यंत पवित्र पर्व है। यह पर्व धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है क्योंकि इस दिन भगवान कार्तिकेय ने दैत्य तारकासुर का वध कर देवताओं को विजय दिलाई थी। 2025 में मनाई जा रही सुब्रह्मण्य षष्ठी के अवसर पर भक्त विशेष पूजा-विधि अपनाकर मंगल दोष, पितृ दोष, संतान सुख में बाधा और जीवन की अनेक कठिनाइयों से मुक्ति पाने का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
सुब्रह्मण्य षष्ठी पर पूजा करने से पहले सुबह जल्दी स्नान कर साफ वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। पूजा स्थान को स्वच्छ कर भगवान कार्तिकेय की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। पूजा सामग्री में आमतौर पर—कुंकुम, हल्दी, चावल, लाल और पीले फूल, धूप-दीप, नैवेद्य (खीर, फल या पायसम), नाग के आकार के मिठाई, चंदन, पंचामृत, पान के पत्ते, नारियल, और बेलपत्र शामिल होते हैं। दक्षिण भारत में इस दिन विशेष रूप से नींबू की माला, सिंदूर, और कवड़ी चढ़ाने की परंपरा भी है।
पूजा की शुरुआत गणेश वंदना के साथ करें, क्योंकि हर शुभ कार्य से पहले गणपति जी का ध्यान आवश्यक होता है। इसके बाद भगवान कार्तिकेय को जल, दूध, शहद और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। अभिषेक के बाद कार्तिकेय जी के मंत्रों का जाप करना अत्यंत शुभ माना गया है। विशेष रूप से
“ॐ सरवनभवाय नमः”
का जाप अत्यधिक फलदायी माना जाता है।
मंत्रजाप के बाद उन्हें लाल फूल, फल, मिठाई और प्रसाद अर्पित करें। अंत में आरती कर परिवार के सभी सदस्यों के साथ प्रसाद ग्रहण करें। भक्त इस दिन व्रत भी रखते हैं, जिसमें पूरे दिन सात्त्विक भोजन और संयम का पालन किया जाता है। दक्षिण भारत में इस अवसर पर मुरुगन के मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्त दर्शन और विशेष अभिषेक के लिए पहुंचते हैं।
माना जाता है कि सुब्रह्मण्य षष्ठी पर विधिवत पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में साहस, ऊर्जा, शौर्य और सफलता बढ़ती है। यह पर्व नकारात्मक शक्तियों को दूर कर जीवन में स्थिरता और सौभाग्य लाने वाला माना जाता है। इसलिए भक्त पूरे भक्तभाव से इस दिन भगवान कार्तिकेय की आराधना करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।



