Sherawali Mata: मां दुर्गा को क्यों कहते हैं शेरावाली माता?

मां दुर्गा को भक्त श्रद्धा से शेरावाली माता कहकर पुकारते हैं। उनकी तस्वीरों और मूर्तियों में अक्सर उन्हें सिंह या बाघ पर सवार दिखाया जाता है। देवी की सवारी को शक्ति, साहस और बुराई पर विजय का प्रतीक माना जाता है। लेकिन शेरावाली माता नाम के पीछे एक प्रचलित पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है।
एक कथा के अनुसार, देवी पार्वती जब तपस्या कर रही थीं, तब एक शेर उनके पास आकर बैठ गया। वह लंबे समय तक देवी की तपस्या पूरी होने की प्रतीक्षा करता रहा। तपस्या पूरी होने पर देवी ने उसकी निष्ठा से प्रसन्न होकर उसे अपनी सवारी बना लिया। इसी मान्यता के आधार पर मां दुर्गा को शेरावाली माता कहा जाने लगा।
मां दुर्गा को क्यों कहा जाता है शेरावाली माता?
मां दुर्गा को शेरावाली माता कहने के पीछे उनकी सवारी से जुड़ी धार्मिक मान्यता है। उत्तर भारत में देवी दुर्गा को इस नाम से विशेष रूप से पुकारा जाता है। भक्तों के लिए मां का शेर पर सवार रूप शक्ति, निर्भयता और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। हालांकि, देवी की सवारी को अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में सिंह या बाघ के रूप में भी दर्शाया जाता है।
देवी पार्वती की तपस्या से जुड़ी पौराणिक कथा
एक प्रचलित कथा के अनुसार, देवी पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या करती थीं। तपस्या के दौरान उनका रंग सांवला पड़ गया था। कथा में आगे बताया जाता है कि एक दिन भगवान शिव के साथ बातचीत के बाद देवी ने पुनः गौर वर्ण प्राप्त करने के लिए तपस्या शुरू कर दी। इसी प्रसंग को देवी के महागौरी स्वरूप से भी जोड़ा जाता है।
कैसे शेर बना मां दुर्गा की सवारी?
कथा के अनुसार, जब देवी पार्वती तपस्या में लीन थीं, तब एक भूखा शेर वहां पहुंचा। उसने देवी को अपना शिकार बनाने की प्रतीक्षा की, लेकिन देवी की तपस्या लंबे समय तक चलती रही। इस दौरान शेर भी वहीं बैठा रहा। जब देवी की तपस्या पूरी हुई, तो उन्होंने शेर की प्रतीक्षा और धैर्य को देखकर उसे अपनी सवारी बना लिया। इस तरह शेर और देवी के संबंध की यह कथा प्रचलित हुई।
मां दुर्गा की सवारी क्या संदेश देती है?
धार्मिक प्रतीकों में सिंह या बाघ को शक्ति, साहस और पराक्रम से जोड़ा जाता है। मां दुर्गा का ऐसे शक्तिशाली पशु पर सवार होना इस विचार का प्रतीक माना जाता है कि दिव्य शक्ति बुराई और अनियंत्रित प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर सकती है। देवी का यह स्वरूप भक्तों को साहस, आत्मविश्वास और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है।
मां दुर्गा को कहीं सिंह तो कहीं बाघ पर क्यों दिखाया जाता है?
मां दुर्गा की प्रतिमाओं और चित्रों में उनकी सवारी हर जगह एक जैसी नहीं होती। कई परंपराओं में उन्हें सिंह पर सवार दिखाया जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में बाघ के साथ उनका चित्रण मिलता है। यह अंतर स्थानीय धार्मिक परंपराओं, देवी के अलग-अलग रूपों और कला-शैलियों से जुड़ा है। दोनों ही पशु देवी की शक्ति और पराक्रम के प्रतीक माने जाते हैं।
नवरात्रि में शेरावाली माता की पूजा का महत्व
नवरात्रि के दौरान भक्त मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा करते हैं और उनसे सुख, शांति, साहस तथा परिवार की मंगलकामना करते हैं। शेरावाली माता का स्मरण भक्तों के लिए बुराई पर अच्छाई की विजय और संकटों का सामना करने की शक्ति का प्रतीक है। मंदिरों में भजन और जयकारों के दौरान भी ‘जय माता दी’ और ‘शेरावाली माता की जय’ के उद्घोष सुनाई देते हैं।
निष्कर्ष: मां दुर्गा को शेरावाली माता कहने के पीछे उनकी सवारी और उससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं हैं। देवी पार्वती की तपस्या और शेर की कथा इस नाम की लोकप्रिय व्याख्याओं में से एक है। इसे धार्मिक परंपरा और आस्था के संदर्भ में समझा जाता है।



