महाराष्ट्र सरकार ने 2006 के मुंबई ट्रेन ब्लास्ट मामले में दोषियों की रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। सरकार का कहना है कि इस जघन्य आतंकी हमले में सैकड़ों निर्दोष नागरिकों की जान गई और ऐसे गंभीर आरोपियों की रिहाई कानून और न्याय की भावना के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए मामले की सुनवाई के लिए 24 जुलाई की तारीख निर्धारित की है।
गौरतलब है कि 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार सात धमाके हुए थे, जिनमें 189 लोगों की मौत हो गई थी और 800 से अधिक घायल हुए थे। इस हमले को भारत के सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक माना जाता है। करीब 9 साल की लंबी सुनवाई के बाद 2015 में विशेष अदालत ने कई आरोपियों को दोषी ठहराया था और कुछ को फांसी और उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
हाल ही में उच्च न्यायालय के एक फैसले के तहत कुछ आरोपियों की रिहाई की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिस पर महाराष्ट्र सरकार ने आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। राज्य सरकार का तर्क है कि इस तरह की रिहाई न केवल पीड़ित परिवारों के साथ अन्याय है, बल्कि यह समाज में आतंक के खिलाफ चल रही लड़ाई को कमजोर करने वाला कदम भी साबित हो सकता है।
महाराष्ट्र सरकार की याचिका में कहा गया है कि दोषियों की सजा की समीक्षा करने या उन्हें रिहा करने से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा, पीड़ितों के अधिकार और व्यापक जनहित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह इस मामले में न्यायपूर्ण निर्णय ले ताकि देश में न्यायपालिका की साख बनी रहे और आतंकी घटनाओं से निपटने के लिए कड़ा संदेश जाए।
इस केस पर पूरे देश की नजर है क्योंकि यह न सिर्फ एक दर्दनाक इतिहास की याद दिलाता है, बल्कि यह भी तय करेगा कि भारत की न्याय प्रणाली आतंकवाद से जुड़े मामलों में कितनी सख्ती से पेश आती है।



