
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां समानता और न्याय संविधान के मूल सिद्धांत हैं, वहां जातिगत भेदभाव आज भी समाज के कुछ हिस्सों में गहरी जड़ें जमाए हुए है। हाल ही में एक मामले में हाईकोर्ट ने इस प्रकार के भेदभाव पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि, “हम मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकते जब नागरिकों के साथ उनके मूलभूत अधिकारों में भेदभाव हो रहा हो, खासकर जब बात पानी जैसी बुनियादी जरूरत की हो।”
यह मामला एक ग्रामीण क्षेत्र का है, जहां कथित रूप से दलित समुदाय के लोगों को सार्वजनिक जलस्रोत से पानी भरने से रोका गया। इस संबंध में याचिका दायर की गई थी, जिसमें बताया गया कि गांव के उच्च जाति के कुछ लोगों ने दलित परिवारों को सार्वजनिक हैंडपंप और कुंओं से पानी लेने से मना कर दिया। इस अमानवीय व्यवहार पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि पानी जीवन का अधिकार है, और इसे किसी भी आधार पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता — न जाति, न धर्म, न लिंग।
न्यायालय ने प्रशासनिक अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि वे ऐसी शिकायतों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। यह उनका कर्तव्य है कि वे सुनिश्चित करें कि हर व्यक्ति को बराबर का हक मिले, खासकर उन संसाधनों पर जो सार्वजनिक हैं और जिनकी आवश्यकता सभी को समान रूप से होती है। कोर्ट ने अधिकारियों को चेतावनी दी कि यदि आगे भी ऐसी घटनाएं होती हैं और प्रशासन निष्क्रिय रहता है, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 15 और 21 हर नागरिक को भेदभाव रहित जीवन और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। जाति आधारित भेदभाव केवल असंवैधानिक ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन भी है। न्यायालय ने इस मामले को एक उदाहरण के रूप में लेते हुए समाज को भी सख्त संदेश दिया कि सह-अस्तित्व, समावेश और समानता ही भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, “हम उस युग में नहीं रह सकते जहां लोग अपनी जाति के आधार पर पानी जैसी बुनियादी चीज़ के लिए भी संघर्ष करें। यदि हम मूकदर्शक बने रहेंगे, तो यह न केवल संविधान का अपमान होगा, बल्कि मानवता की भी हार होगी।”
इस फैसले को सामाजिक न्याय के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। इससे न केवल पीड़ितों को न्याय मिलेगा, बल्कि यह देशभर के प्रशासनिक तंत्र को भी चेतावनी है कि वे ऐसे मामलों में आंख मूंदकर न बैठें।



