
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि “सनातन विचार ही एकात्म मानव दर्शन” है। उनके इस विचार ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों के बीच गहरी चर्चा को जन्म दे दिया। भागवत ने बताया कि सनातन संस्कृति केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र सभी को जोड़ने का काम करती है। उन्होंने एकात्म मानव दर्शन को भारत की मूल सोच का प्रतिबिंब बताया और कहा कि यह दर्शन मानवता के समग्र विकास की राह दिखाता है।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि सनातन विचारधारा आत्मा और प्रकृति के बीच समन्वय स्थापित करने की क्षमता रखती है। यह विचार केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यवहारिक जीवन में भी लागू होता है। उन्होंने बताया कि एकात्म मानव दर्शन का मुख्य आधार “सभी का विकास और सबका कल्याण” है, जिसमें व्यक्ति का हित राष्ट्र के हित से जुड़ा होता है। इसलिए यह दर्शन सामाजिक एकता, समरसता और संतुलन का संदेश देता है।
मोहन भागवत ने आगे कहा कि आज के समय में दुनिया कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है—चाहे वह पर्यावरण संकट हो, सामाजिक विघटन हो या मानसिक तनाव का बढ़ता स्तर। ऐसे में सनातन विचारधारा दुनिया को समाधान दे सकती है, क्योंकि यह मनुष्य को प्रकृति से जोड़ती है और जीवन में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती है। उन्होंने बताया कि भारत की संस्कृति में सदियों से “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना रही है, जिसे आधुनिक समय में भी अपनाने की जरूरत है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत का विकास केवल आर्थिक प्रगति से नहीं होगा, बल्कि मूल्य-आधारित समाज निर्माण से ही सच्चा विकास संभव है। एकात्म मानव दर्शन इसी दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझने और समाज के उत्थान के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है।
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे देश की सांस्कृतिक जड़ों को समझें, सनातन विचारधारा को सही रूप में ग्रहण करें और समाज के लिए सकारात्मक योगदान दें।
कुल मिलाकर, मोहन भागवत का यह संदेश न केवल भारतीय दर्शन की गहराई को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि आधुनिक समय में सनातन विचार आज भी कितना प्रासंगिक है।



