Makar Sankranti 2026: भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति पर ही क्यों त्यागा शरीर? जानिए पौराणिक कारण

मकर संक्रांति का पर्व केवल फसल और सूर्य उपासना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा संबंध भारतीय पौराणिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह की कथा इस पर्व को और भी विशेष बना देती है। माना जाता है कि भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन ही अपने शरीर का त्याग किया था, और इसके पीछे की वजह जानकर कोई भी हैरान रह जाता है।
भीष्म पितामह को माता गंगा से इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसका अर्थ था कि वे अपनी इच्छा से ही प्राण त्याग सकते थे। कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान जब वे अर्जुन के बाणों से घायल होकर शरशय्या पर लेटे, तब भी उन्होंने तुरंत शरीर नहीं छोड़ा। युद्ध समाप्त होने के बाद भी वे महीनों तक शरशय्या पर ही पड़े रहे। इसका कारण केवल उनका संकल्प ही नहीं, बल्कि सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा भी था।
हिंदू धर्म में उत्तरायण को अत्यंत पवित्र और शुभ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, उत्तरायण के समय शरीर त्याग करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है, तभी उत्तरायण की शुरुआत होती है, जिसे मकर संक्रांति कहा जाता है। भीष्म पितामह इस आध्यात्मिक रहस्य को भली-भांति जानते थे, इसलिए उन्होंने दक्षिणायन में प्राण त्याग करना उचित नहीं समझा।
मान्यता है कि दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि और उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा जाता है। ऐसे में उत्तरायण के दौरान देह त्याग करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति होती है। यही कारण था कि भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने तक प्रतीक्षा की। जैसे ही मकर संक्रांति का पावन दिन आया और सूर्य उत्तरायण हुआ, भीष्म पितामह ने योग द्वारा अपने प्राणों का त्याग कर दिया।
यह घटना न केवल भीष्म पितामह की महानता को दर्शाती है, बल्कि मकर संक्रांति के धार्मिक महत्व को भी उजागर करती है। आज भी मकर संक्रांति के दिन दान, स्नान और पुण्य कर्मों का विशेष महत्व माना जाता है। भीष्म पितामह की यह कथा हमें सिखाती है कि सही समय, सही संकल्प और आध्यात्मिक ज्ञान जीवन और मृत्यु दोनों को सार्थक बना सकता है।



