
क्या भारत के लिए एक एस जयशंकर ही काफी हैं—यह सवाल हाल के दिनों में इसलिए उठा क्योंकि विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने एक सार्वजनिक मंच पर ऐसा जवाब दिया, जिसने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और सोच की याद दिला दी। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि किसी भी देश की विदेश नीति एक व्यक्ति के दम पर नहीं चलती, बल्कि यह मजबूत नेतृत्व, संस्थागत क्षमता और कुशल टीमवर्क का परिणाम होती है। उनका यह ‘मोदी वाला’ जवाब आत्मविश्वास से भरा, स्पष्ट और जिम्मेदारी साझा करने वाला था। उन्होंने कहा कि भारत आज वैश्विक मंच पर इसलिए मजबूती से खड़ा है क्योंकि निर्णय लेने की प्रक्रिया स्पष्ट है, राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार एक दीर्घकालिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ रही है। जयशंकर ने यह भी रेखांकित किया कि विदेश नीति में निरंतरता और पेशेवर दक्षता बेहद जरूरी है, जिसे भारत ने वर्षों की मेहनत से विकसित किया है। चीन, अमेरिका, रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और पड़ोसी देशों के साथ संतुलित रिश्तों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि भारत अब प्रतिक्रियावादी नहीं, बल्कि सक्रिय और परिणामोन्मुख कूटनीति अपनाता है। उनके अनुसार, आज भारत अपने हितों पर स्पष्ट है—चाहे वह सीमा सुरक्षा हो, ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार, तकनीक या भारतीयों की सुरक्षा। जयशंकर का जवाब इस बात का संकेत भी था कि व्यक्तिपूजा से आगे बढ़कर संस्थागत मजबूती जरूरी है। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि देश सेवा केवल एक चेहरे पर निर्भर नहीं होती; इसके लिए सक्षम टीम, नीति-नियोजन और जवाबदेही की संस्कृति चाहिए। यह वही दृष्टिकोण है जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार दोहराया है—नेतृत्व दिशा देता है, लेकिन सफलता सामूहिक प्रयास से मिलती है। कुल मिलाकर, जयशंकर का बयान न केवल उनकी परिपक्व कूटनीतिक समझ को दर्शाता है, बल्कि भारत की नई विदेश नीति का आत्मविश्वासी स्वर भी सामने लाता है, जहां व्यक्ति से अधिक प्रणाली और राष्ट्रीय हित को महत्व दिया जाता है।



