
अमेरिका में एच-1बी वीजा शुल्क को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी विवाद सामने आया है। हाल ही में अमेरिका के 20 राज्यों ने प्रस्तावित या लागू किए गए एच-1बी वीजा शुल्क के खिलाफ खुलकर विरोध दर्ज कराया है और केंद्र सरकार को कड़ी चेतावनी दी है। इन राज्यों का कहना है कि वीजा शुल्क में अत्यधिक बढ़ोतरी न केवल विदेशी कुशल श्रमिकों के लिए नुकसानदायक है, बल्कि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था, तकनीकी उद्योग और स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। एच-1बी वीजा कार्यक्रम के तहत बड़ी संख्या में आईटी, हेल्थकेयर, इंजीनियरिंग और रिसर्च सेक्टर के प्रोफेशनल्स अमेरिका में काम करते हैं, जिनमें भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। ऐसे में शुल्क बढ़ाने का फैसला सीधे तौर पर कंपनियों की भर्ती योजनाओं और प्रतिभा की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है।
विरोध करने वाले राज्यों का तर्क है कि एच-1बी वीजा धारक अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां नहीं छीनते, बल्कि वे उन क्षेत्रों में काम करते हैं जहां स्किल गैप पहले से मौजूद है। राज्यों ने चेतावनी दी है कि यदि शुल्क बढ़ोतरी को वापस नहीं लिया गया, तो वे कानूनी विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं। उनका कहना है कि यह कदम संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ है और इससे राज्यों की आर्थिक प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी। टेक्नोलॉजी हब माने जाने वाले कई राज्यों ने विशेष रूप से चिंता जताई है कि अधिक शुल्क के कारण कंपनियां अमेरिका के बजाय अन्य देशों में निवेश और हायरिंग को प्राथमिकता दे सकती हैं।
भारतीय आईटी कंपनियों और अमेरिका में काम कर रहे प्रोफेशनल्स के लिए यह मुद्दा बेहद अहम है। एच-1बी वीजा शुल्क बढ़ने से न केवल वीजा आवेदन की लागत बढ़ेगी, बल्कि नियोक्ताओं पर भी अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। इससे नई भर्तियों में कमी, प्रोजेक्ट्स में देरी और वैश्विक टैलेंट मूवमेंट पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्यों का दबाव बढ़ता है, तो केंद्र सरकार को इस नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। कुल मिलाकर, 20 अमेरिकी राज्यों का यह विरोध संकेत देता है कि एच-1बी वीजा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अमेरिका के भीतर भी मतभेद गहरे हैं और आने वाले समय में इस पर बड़ा फैसला देखने को मिल सकता है।



