
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के अमेरिका दौरे के दौरान 670 किलोमीटर का बाई रोड सफर लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा और अब चार महीने बाद इसके पीछे की वजह सामने आई है। बताया जा रहा है कि यह यात्रा केवल एक सामान्य आवागमन नहीं थी, बल्कि इसके पीछे कूटनीतिक, सुरक्षा और रणनीतिक तीनों स्तरों पर गहरी सोच काम कर रही थी। उस समय अमेरिका में उच्चस्तरीय बैठकों और प्रवासी भारतीयों से संवाद का कार्यक्रम था, जिसमें समय-सारिणी बेहद सघन थी। कुछ स्थानों पर हवाई यात्रा संभव न होने और सुरक्षा एजेंसियों की सलाह के चलते सड़क मार्ग को प्राथमिकता दी गई। इसके अलावा, यह भी सामने आया है कि इस लंबे सफर के दौरान जयशंकर ने अमेरिकी प्रशासन के प्रतिनिधियों, थिंक टैंक सदस्यों और भारतीय समुदाय के प्रमुख लोगों से अनौपचारिक लेकिन बेहद अहम बातचीत की। कूटनीति में अक्सर ऐसे ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ संवाद औपचारिक बैठकों से ज्यादा प्रभावी साबित होते हैं। माना जा रहा है कि इंडो-पैसिफिक रणनीति, रक्षा सहयोग, टेक्नोलॉजी साझेदारी और भारत-अमेरिका रिश्तों को नई ऊंचाई देने जैसे विषयों पर इसी यात्रा के दौरान कई बिंदुओं पर सहमति की जमीन तैयार हुई। चार महीने बाद जब यह खुलासा हुआ तो यह भी स्पष्ट हुआ कि जयशंकर का यह रोड ट्रिप प्रतीकात्मक रूप से भी अहम था—यह संदेश देने के लिए कि भारत अपने साझेदार देशों के साथ संबंधों में औपचारिकता से आगे बढ़कर भरोसे और निरंतर संवाद को प्राथमिकता देता है। साथ ही, प्रवासी भारतीयों के बीच जाकर उनसे सीधे जुड़ना सरकार की उस नीति का हिस्सा है, जिसमें विदेशों में बसे भारतीयों को भारत की विकास यात्रा से जोड़े रखने पर जोर दिया जाता है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ संवेदनशील बैठकों और स्थानों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए भी सड़क मार्ग अधिक सुरक्षित और नियंत्रित विकल्प माना गया। कुल मिलाकर, 670 किलोमीटर का यह बाई रोड सफर एक साधारण यात्रा नहीं, बल्कि भारत की सक्रिय और बहुआयामी कूटनीति का उदाहरण था, जिसकी परतें अब समय के साथ सामने आ रही हैं।



