
अमेरिकी राजनीति में समय-समय पर ऐसे सिद्धांत उभरते हैं, जो वैश्विक कूटनीति की दिशा तय करते हैं। इन्हीं में से एक है डोनरो सिद्धांत, जिसे हाल के वर्षों में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति से जोड़कर देखा जाता है। सवाल यह उठता है कि जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर मानवाधिकार उल्लंघन और तानाशाही के गंभीर आरोप थे, तब भी ट्रंप प्रशासन ने उन पर निर्णायक सैन्य या प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रहार क्यों नहीं किया। इसका जवाब तेल की राजनीति और चीन के बढ़ते प्रभाव में छिपा माना जाता है।
वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक देश है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए यह क्षेत्र लंबे समय से रणनीतिक महत्व रखता रहा है। ट्रंप प्रशासन, जो ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर चलता था, किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहता था जिससे वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता पैदा हो। मादुरो सरकार को पूरी तरह झटका देने का मतलब था तेल आपूर्ति में बड़ा संकट, जिसका सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं और वैश्विक कीमतों पर पड़ सकता था।
यहीं से चीन का एंगल सामने आता है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने पिछले एक दशक में लैटिन अमेरिका में बड़े पैमाने पर निवेश बढ़ाया है। वेनेजुएला चीन का एक प्रमुख साझेदार रहा है, जिसने अरबों डॉलर के कर्ज और ऊर्जा समझौतों के जरिए वहां मजबूत पकड़ बनाई। अगर अमेरिका सीधे हस्तक्षेप करता, तो यह न सिर्फ तेल युद्ध बनता, बल्कि चीन-अमेरिका टकराव का नया मोर्चा भी खुल सकता था। ट्रंप, जो पहले ही व्यापार युद्ध में चीन से उलझे हुए थे, शायद एक और भू-राजनीतिक टकराव मोल नहीं लेना चाहते थे।
डोनरो सिद्धांत के तहत यह माना जाता है कि किसी भी देश के खिलाफ कठोर कदम उठाने से पहले उसके संसाधनों, वैश्विक साझेदारों और दीर्घकालिक प्रभावों को प्राथमिकता दी जाती है। ट्रंप की रणनीति भी कुछ ऐसी ही दिखी—सीधे टकराव के बजाय आर्थिक दबाव, प्रतिबंध और कूटनीतिक बयानबाजी।
इस पूरे परिदृश्य में यह कहना गलत नहीं होगा कि ट्रंप का मादुरो पर नरम रुख सिर्फ मानवीय या राजनीतिक नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति का हिस्सा था। डोनरो सिद्धांत इसी संतुलनकारी सोच का प्रतीक बनकर उभरता है, जहां तेल और वैश्विक शक्ति संतुलन निर्णायक भूमिका निभाते हैं।



