
शीत युद्ध के दौर में क्यूबा और अमेरिका के रिश्ते दुनिया की सबसे तनावपूर्ण राजनीतिक दुश्मनियों में गिने जाते हैं। 1959 में फिदेल कास्त्रो की अगुवाई में हुई क्यूबा की क्रांति के बाद जब अमेरिका समर्थित तानाशाह बतिस्ता सत्ता से हटा, तभी से वाशिंगटन ने कास्त्रो सरकार को गिराने का लक्ष्य बना लिया। अमेरिका को डर था कि क्यूबा सोवियत संघ का प्रभाव क्षेत्र बन जाएगा और लैटिन अमेरिका में समाजवाद की लहर फैल जाएगी। इसी वजह से सीआईए ने क्यूबा में सत्ता परिवर्तन के लिए एक के बाद एक गुप्त योजनाएं बनाईं। 1961 में ‘बे ऑफ पिग्स’ हमला इसका सबसे बड़ा उदाहरण था, जिसमें अमेरिका समर्थित क्यूबाई विद्रोहियों ने क्यूबा पर हमला किया, लेकिन कास्त्रो की सेना ने इसे कुछ ही दिनों में विफल कर दिया। इसके बाद शुरू हुआ ‘ऑपरेशन मंगूस’, जो कास्त्रो सरकार को अंदर से कमजोर करने की एक बड़ी अमेरिकी साजिश थी। इसके तहत आर्थिक प्रतिबंध, तोड़फोड़, प्रचार युद्ध और यहां तक कि कास्त्रो की हत्या की योजनाएं भी शामिल थीं।
सीआईए द्वारा बनाई गई योजनाएं इतनी अजीब थीं कि वे आज भी इतिहास में हैरानी का विषय हैं। कास्त्रो को मारने के लिए ज़हरीला सिगार, विस्फोटक भरी सीप, जहरीली पेन, यहां तक कि उनकी दाढ़ी झाड़ने के लिए रसायन तक तैयार किए गए। कहा जाता है कि सीआईए ने कास्त्रो को खत्म करने के लिए 600 से ज्यादा बार अलग-अलग तरीके आजमाने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह बच निकलते थे। अमेरिका ने क्यूबा की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए व्यापार प्रतिबंध लगाए, पर्यटन रोक दिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर क्यूबा को अलग-थलग करने की रणनीति अपनाई, ताकि जनता सरकार से नाराज़ हो जाए। लेकिन इसके उलट, इन दबावों ने कास्त्रो को देश के भीतर और मजबूत कर दिया।
क्यूबा में सत्ता बदलने की ये कोशिशें केवल सैन्य या गुप्त अभियानों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध का भी हिस्सा थीं। रेडियो प्रसारणों, अफवाहों और विपक्षी समूहों के ज़रिए जनता को भड़काने की कोशिशें की गईं। फिर भी, कास्त्रो करीब पांच दशक तक सत्ता में बने रहे और अमेरिका की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुईं। आज भी ऑपरेशन मंगूस और सिगार बम जैसी कहानियां इस बात की याद दिलाती हैं कि कैसे एक छोटी-सी कैरिबियाई राष्ट्र ने दुनिया की सबसे ताकतवर महाशक्ति को दशकों तक चुनौती दी।



