
ग्रीनलैंड को लेकर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने अमेरिकी राजनीति में एक बार फिर हलचल मचा दी है। ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर अमेरिका के नियंत्रण या रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने जैसे संकेतों के बाद उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। जहां ट्रंप समर्थक धड़ा इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्कटिक क्षेत्र में चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने तथा खनिज संसाधनों तक पहुंच के नजरिए से सही ठहराने की कोशिश कर रहा है, वहीं कई वरिष्ठ रिपब्लिकन सांसदों ने इस सोच पर सवाल उठाए हैं। इन नेताओं का कहना है कि किसी संप्रभु क्षेत्र या स्वायत्त क्षेत्र के भविष्य को लेकर इस तरह की बयानबाजी न केवल कूटनीतिक रूप से गलत है, बल्कि इससे अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुंच सकता है। आलोचकों का मानना है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है और वहां के लोगों की इच्छा सर्वोपरि है, ऐसे में किसी भी तरह का “कब्जे” या दबाव की भाषा लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ जाती है। कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका को अपने सहयोगियों के साथ सम्मानजनक और साझेदारी आधारित संबंध रखने चाहिए, न कि व्यापारिक सौदे या रणनीतिक मजबूरी के तौर पर क्षेत्रों को देखने की मानसिकता अपनानी चाहिए। पार्टी के भीतर उठ रही इन आवाज़ों से यह संकेत मिलता है कि रिपब्लिकन खेमे में विदेश नीति को लेकर एकरूपता नहीं रही है। एक तरफ ट्रंप का राष्ट्रवादी और आक्रामक रुख है, जो अमेरिका फर्स्ट की विचारधारा को आगे बढ़ाता है, तो दूसरी ओर वह वर्ग है जो पारंपरिक कूटनीति, गठबंधनों और अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन को जरूरी मानता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह मतभेद आने वाले चुनावों और पार्टी की रणनीति पर भी असर डाल सकता है, क्योंकि इससे मतदाताओं के सामने यह सवाल खड़ा होता है कि रिपब्लिकन पार्टी किस तरह की वैश्विक भूमिका चाहती है। ग्रीनलैंड विवाद ने यह साफ कर दिया है कि ट्रंप का प्रभाव अब भी मजबूत है, लेकिन पार्टी के भीतर असहमति की आवाजें भी उतनी ही मुखर होती जा रही हैं, जो आने वाले समय में अमेरिकी राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।



