
भारत और बांग्लादेश के संबंधों को लेकर केंद्र सरकार ने एक बार फिर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सरकार ने कहा है कि दोनों देशों के रिश्ते किसी भी तथाकथित “तीसरी दुनिया” की राजनीति, समूहबंदी या बाहरी प्रभाव से स्वतंत्र हैं और इन्हें द्विपक्षीय विश्वास, साझा इतिहास और पारस्परिक हितों के आधार पर आगे बढ़ाया जाता है। इस बयान को क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि हाल के दिनों में दक्षिण एशिया में बदलते समीकरणों और वैश्विक शक्तियों की बढ़ती सक्रियता को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं। केंद्र का कहना है कि भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति पड़ोसी देशों के साथ सीधे संवाद, विकास साझेदारी और लोगों के बीच संपर्क को मजबूत करने पर आधारित है, न कि किसी वैचारिक खेमेबंदी पर। बांग्लादेश भारत का एक महत्वपूर्ण साझेदार है, चाहे बात कनेक्टिविटी परियोजनाओं की हो, व्यापार की, ऊर्जा सहयोग की या सुरक्षा समन्वय की। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच रेल, सड़क और जलमार्ग संपर्क में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जिससे न सिर्फ आपसी व्यापार बढ़ा है बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र को भी फायदा पहुंचा है। सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि भारत और बांग्लादेश ने सीमा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी सहयोग और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने के मामले में मिलकर काम किया है, जो आपसी भरोसे का प्रतीक है। विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि यह बयान उन अटकलों को विराम देने के लिए है, जिनमें कहा जा रहा था कि क्षेत्रीय रिश्ते बड़े वैश्विक समीकरणों से प्रभावित हो सकते हैं। नई दिल्ली का संदेश साफ है कि ढाका के साथ संबंध किसी तीसरे पक्ष की वजह से तय नहीं होंगे। दोनों देश अपनी विकास प्राथमिकताओं, आर्थिक जरूरतों और जनता की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ेंगे। आने वाले समय में व्यापार विस्तार, डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा ग्रिड और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में सहयोग और गहरा हो सकता है। कुल मिलाकर, केंद्र सरकार का यह बयान बताता है कि भारत अपने पड़ोसी के साथ स्थिर, व्यावहारिक और भरोसेमंद रिश्तों को प्राथमिकता देता है, जो किसी बाहरी दबाव या वैश्विक लेबल से परे हैं।



