मेट्रो कोच में सिल्वर सीट का राज क्या है, जानिए डिजाइन और तकनीक की पूरी कहानी

दिल्ली मेट्रो में सफर करने वाले यात्रियों ने अक्सर एक बात नोटिस की होगी कि कई कोचों में सीटों का रंग सिल्वर या स्टील जैसा नजर आता है, जबकि कुछ लाइनों में अलग रंग की सीटें भी दिखाई देती हैं। खासकर ब्लूलाइन में यह सिल्वर फिनिश ज्यादा ध्यान खींचती है। पहली नजर में यह सिर्फ डिजाइन का हिस्सा लगता है, लेकिन इसके पीछे तकनीक, रखरखाव, स्वच्छता और सुरक्षा से जुड़ी कई व्यावहारिक वजहें छिपी हुई हैं। दरअसल मेट्रो रोजाना लाखों यात्रियों को ढोती है। इतनी भारी भीड़ के बीच सीटों का टिकाऊ होना, जल्दी खराब न होना और साफ रखना बहुत बड़ी चुनौती है।
सिल्वर रंग की सीटें आमतौर पर स्टेनलेस स्टील या मेटल फिनिश वाली होती हैं। यह सामग्री मजबूत होती है, खरोंच और टूट-फूट का असर कम पड़ता है और लंबे समय तक चलती है। कपड़े या कुशन वाली सीटों में दाग लगने, फटने या बदबू आने की समस्या ज्यादा रहती है, जबकि स्टील सीटों को साफ करना आसान होता है। मेट्रो स्टाफ थोड़े से प्रयास में इन्हें जल्दी से सैनिटाइज कर सकता है। महामारी के बाद से स्वच्छता को लेकर जो जागरूकता बढ़ी है, उसमें इस तरह की सीटें और भी उपयोगी साबित होती हैं।
ब्लूलाइन देश की सबसे व्यस्त लाइनों में से एक मानी जाती है। यहां यात्रियों की संख्या बहुत ज्यादा होती है, इसलिए ऐसे मैटेरियल का चुनाव किया गया जो भारी इस्तेमाल को झेल सके। मेटल सीटें नमी, धूल और लगातार उपयोग के बावजूद अपनी गुणवत्ता बनाए रखती हैं। साथ ही, इन पर रंग फीका पड़ने या उखड़ने का खतरा भी कम रहता है।
एक और दिलचस्प पहलू है तापमान और रखरखाव लागत। मेटल सीटों को बदलने की जरूरत कम पड़ती है, जिससे लंबे समय में खर्च घटता है। कुल मिलाकर सिल्वर सीटें सिर्फ देखने में मॉडर्न नहीं लगतीं, बल्कि वे टिकाऊपन, सफाई और सुविधा का संतुलन भी बनाती हैं। यही वजह है कि दिल्ली मेट्रो ने खासकर ज्यादा भीड़ वाली लाइनों में इस तरह के डिजाइन को प्राथमिकता दी है।



