
देश में शोध और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इस राह में नौकरशाही एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है। हाल ही में वरिष्ठ वैज्ञानिक Dr. N. Kalaiselvi Mande (डॉ. मांडे) ने कहा कि शोध क्षेत्र में प्रशासनिक प्रक्रियाएं अक्सर रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच को सीमित कर देती हैं। उनका मानना है कि हर प्रोजेक्ट और हर विचार को एक ही फार्मूले से आंकना वैज्ञानिक प्रगति के लिए बाधक है। रिसर्च का स्वभाव ही प्रयोगधर्मी और जोखिम भरा होता है, ऐसे में यदि उसे सख्त नियमों और एक जैसे पैमानों में बांध दिया जाए, तो नई खोजों की संभावनाएं कम हो जाती हैं।
डॉ. मांडे ने इस बात पर जोर दिया कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में लचीलापन बेहद जरूरी है। हर शोध परियोजना का उद्देश्य, संसाधन और समयसीमा अलग होती है। यदि फंडिंग, अनुमोदन और मूल्यांकन की प्रक्रिया में अत्यधिक कागजी कार्यवाही हो, तो शोधकर्ताओं का समय और ऊर्जा प्रशासनिक औपचारिकताओं में ही खर्च हो जाती है। इससे नवाचार की गति धीमी पड़ती है और युवा वैज्ञानिक हतोत्साहित हो सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे देश में, जहां प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, वहां प्रणाली को शोध के अनुकूल बनाना समय की मांग है। विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए जरूरी है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज और पारदर्शी हो। रिसर्च को परिणाम के आधार पर परखा जाना चाहिए, न कि केवल फाइलों और रिपोर्टों के ढांचे पर। यदि हर विचार को पारंपरिक दृष्टिकोण से देखा जाएगा, तो क्रांतिकारी बदलाव संभव नहीं हो पाएंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुधार का रास्ता संतुलन से होकर गुजरता है। जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी हैं, लेकिन साथ ही वैज्ञानिकों को रचनात्मक स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए। डॉ. मांडे के बयान ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि भारत में शोध पारिस्थितिकी तंत्र को अधिक लचीला और नवाचार समर्थ कैसे बनाया जाए, ताकि देश वैश्विक स्तर पर अग्रणी भूमिका निभा सके।



