
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में ईरान से जुड़ी मध्यस्थता की चर्चाओं पर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि भारत किसी भी तरह से “दलाल देश” की भूमिका नहीं निभाता। उन्होंने यह बयान उन अटकलों के बीच दिया, जिनमें कहा जा रहा था कि भारत ईरान और अन्य देशों के बीच मध्यस्थता कर सकता है। जयशंकर ने दो टूक शब्दों में कहा कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र, संतुलित और राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।
उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए कहा कि भारत की तुलना ऐसे देशों से करना गलत है, जिनकी अंतरराष्ट्रीय छवि एक “मध्यस्थ” या “दलाल” के रूप में बनी हुई है। भारत न तो किसी के दबाव में काम करता है और न ही किसी तीसरे पक्ष की भूमिका निभाकर अपने हितों से समझौता करता है।
जयशंकर ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत सभी देशों के साथ अपने संबंधों को समानता और आपसी सम्मान के आधार पर आगे बढ़ाता है। ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत किसी विवाद में हस्तक्षेप करेगा या मध्यस्थ बनेगा।
उनके इस बयान को भारत की मजबूत और आत्मनिर्भर विदेश नीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहां कई देश क्षेत्रीय संघर्षों और कूटनीतिक तनावों में उलझे हुए हैं, भारत ने खुद को एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जयशंकर का यह बयान भारत की वैश्विक स्थिति को और मजबूत करता है। यह संदेश भी साफ करता है कि भारत अब पुराने ढर्रे की कूटनीति से आगे बढ़ चुका है और अपनी शर्तों पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों को परिभाषित करता है।
कुल मिलाकर, ईरान मध्यस्थता के मुद्दे पर जयशंकर की यह प्रतिक्रिया भारत की स्पष्ट नीति और आत्मविश्वास को दर्शाती है। यह दिखाता है कि भारत किसी भी परिस्थिति में अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता से समझौता नहीं करेगा।



