हर गोली जरूरी नहीं! जानिए कब बीपी-शुगर की दवाओं का असर कम और खतरा ज्यादा

आजकल हाई ब्लड प्रेशर (बीपी) और डायबिटीज (शुगर) जैसी बीमारियां आम हो गई हैं। बड़ी संख्या में लोग इन समस्याओं को कंट्रोल करने के लिए रोजाना दवाओं का सेवन करते हैं। लेकिन हाल ही में डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि हर स्थिति में दवाएं फायदेमंद नहीं होतीं। कई बार ऐसा भी होता है कि दवाओं का असर कम होने लगता है और उनके साइड इफेक्ट्स शरीर को नुकसान पहुंचाने लगते हैं।
डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक एक ही दवा लेने से शरीर उस दवा के प्रति सहनशील हो जाता है। ऐसे में दवा का असर धीरे-धीरे कम हो सकता है। खासकर बीपी और शुगर की दवाओं में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। कई मरीज बिना डॉक्टर की सलाह के अपनी दवा की मात्रा बढ़ा देते हैं, जो आगे चलकर किडनी, लिवर और दिल से जुड़ी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हर मरीज की स्थिति अलग होती है। उम्र, लाइफस्टाइल, खानपान और अन्य बीमारियों के आधार पर दवाओं की जरूरत तय होती है। उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति नियमित रूप से व्यायाम करता है, संतुलित आहार लेता है और उसका वजन नियंत्रित है, तो कई बार दवाओं की जरूरत कम हो सकती है। वहीं, कुछ मामलों में दवाओं को बदलना या बंद करना भी जरूरी हो जाता है, लेकिन यह फैसला केवल डॉक्टर ही कर सकते हैं।
इसके अलावा, कुछ दवाएं लंबे समय तक लेने से शरीर में अन्य दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकती हैं, जैसे कमजोरी, चक्कर आना, ब्लड शुगर का अचानक गिरना या बढ़ना, और बीपी का असंतुलन। इसलिए जरूरी है कि मरीज समय-समय पर अपनी जांच करवाते रहें और डॉक्टर से सलाह लेते रहें।
डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि मरीज खुद से दवाएं बंद न करें। अचानक दवा बंद करने से स्थिति और बिगड़ सकती है। सही तरीका यह है कि डॉक्टर की निगरानी में धीरे-धीरे दवा की मात्रा को कम या एडजस्ट किया जाए।
अंत में, यह समझना बेहद जरूरी है कि दवाएं इलाज का एक हिस्सा हैं, पूरा समाधान नहीं। स्वस्थ जीवनशैली, सही खानपान, नियमित व्यायाम और मानसिक तनाव से दूरी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए, तो बीपी और शुगर जैसी बीमारियों को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है और दवाओं पर निर्भरता भी कम की जा सकती है।



