पुत्रदा एकादशी कथा: राजा सुकेतुमान ने क्यों किया था प्राण त्यागने का निश्चय?

प्राचीन समय में भद्रावती नगरी में राजा सुकेतुमान का शासन था। उनकी पत्नी का नाम शैव्या था। दोनों के जीवन में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने का दुख उन्हें लगातार परेशान करता था।
राजा सुकेतुमान को सबसे अधिक चिंता अपने वंश के आगे न बढ़ने की थी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, वह सोचते थे कि उनके बाद पितरों का पिंडदान और तर्पण कौन करेगा। इसी चिंता के कारण वह दिन-रात उदास रहने लगे थे।
धीरे-धीरे राजा का मानसिक दुख इतना बढ़ गया कि एक समय उन्होंने अपने प्राण त्यागने तक का निश्चय कर लिया। हालांकि, आत्महत्या को महापाप मानते हुए उन्होंने इस विचार को त्याग दिया।
इसके बाद राजा घोड़े पर सवार होकर वन की ओर निकल पड़े। वन में घूमते हुए उन्होंने पशु-पक्षियों और प्रकृति को देखा। इसी दौरान वह अपने जीवन की परेशानियों और संतान न होने के कारणों के बारे में सोचते रहे।
वन में आगे बढ़ने पर उन्हें एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया। उसके आसपास ऋषियों के आश्रम थे। राजा वहां पहुंचे और मुनियों को प्रणाम किया। मुनियों ने उन्हें बताया कि उस दिन पुत्रदा एकादशी थी।
राजा ने मुनियों के सामने अपनी सबसे बड़ी इच्छा रखी। उन्होंने बताया कि उनके कोई संतान नहीं है और वह पुत्र प्राप्ति की कामना रखते हैं। मुनियों ने उन्हें पुत्रदा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
राजा ने मुनियों के बताए विधान के अनुसार एकादशी का व्रत किया और द्वादशी को पारण किया। कथा के अनुसार, इसके बाद उनकी पत्नी शैव्या ने गर्भ धारण किया और समय आने पर एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।
कथा में बताया गया है कि राजकुमार आगे चलकर गुणवान, शूरवीर और प्रजा का पालन करने वाला बना। इस प्रकार राजा सुकेतुमान की संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी हुई और उनके जीवन में फिर से खुशियां लौट आईं।
पुत्रदा एकादशी को लेकर अलग-अलग पुराणों में अलग कथाएं मिलती हैं। पौष शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी की कथा राजा सुकेतुमान से जुड़ी है, जबकि श्रावण शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी की कथा में राजा महाजित का प्रसंग मिलता है।
धार्मिक मान्यताओं में पुत्रदा एकादशी को संतान की कामना और संतान के कल्याण से जुड़ा व्रत माना जाता है। राजा सुकेतुमान की कथा का मुख्य संदेश यह है कि कठिन परिस्थितियों में निराश होकर गलत कदम उठाने के बजाय धैर्य, आस्था और उचित मार्ग अपनाना चाहिए। यह कथा धार्मिक मान्यता पर आधारित है।



