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दुर्लभ विल्सन रोग से पीड़ित 8 वर्षीय बच्ची में हुआ सफल जीवनरक्षक एबीओ इन्कम्पेटिबल लिवर ट्रांसप्लान्ट

  • बच्ची कोमा में थी और 36 घण्टे के भीतर उसका लिवर ट्रांसप्लान्ट किया गया
  • विल्सन रोग एक आनुवंशिक विकार है जिसमें शरीर में कॉपर जमा होने के कारण लिवर फेलियर तक हो सकता है
  • 8 वर्षीय बच्ची को कोमा की स्थिति में अपोलो में भर्ती किया गया
  • विल्सन रोग के चलते कोमा के मामलों में बच्चों की मृत्यु की संभवना बहुत अधिक होती है

नई दिल्ली। इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स में बिहार से आई 8 वर्षीय बच्ची में जीवनरक्षक लिवर ट्रांसप्लान्ट सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। बच्ची में दुर्लभ आनुवंशिक रोग विल्सन्स रोग का निदान किया गया था, जिसमें शरीर में अतिरिक्त कॉपर जमा हो जाता है। इसके उपचार के लिए मरीज़ को जीवन भर दवाओं पर ही निर्भर रहना पड़ता है। हालांकि ऐसे कुछ मामलों में लिवर फेलियर के चलते बच्चे कोमा में चले जाते हैं। विलसन रोग में कोमा में चले जाने पर बच्चों में मृत्यु दर 100 फीसदी होती है।

25 मार्च की शाम 8 साल की अंशिका को इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती किया गया, उस समय बच्ची कोमा में थी। इससे पहले एक और अस्पताल में बच्ची का इलाज चल रहा था, जहां उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। अपोलो में डॉ अनुपम सिब्बल, ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर एवं सीनियर पीडिएट्रिक गैस्ट्रोएंट्रोलोजिस्ट, अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप एवं डॉ स्मिता मल्होत्रा और डॉ करूनेश कुमार (कन्सलटेन्ट, पीडिएट्रिक गैस्ट्रोएंट्रोलोजी), डॉ अरूण वी, डॉ वरूण एम, डॉ प्रदीप कुमार (कन्सलटेन्ट्स, लिवर ट्रांसप्लान्ट) और डॉ रमन आर (एनेस्थेटिस्ट) की निगरानी में बच्ची को भर्ती किया गया। भर्ती करते ही तुरंत उसे वेंटीलेटर पर डाला गया और लिवर ट्रांसप्लान्ट की सलाह दी गई। साथ ही डायलिसिस और प्लाज़्मा एक्सचेंज थेरेपी भी की गई, ताकि शरीर से कॉपर को निकाला जा सके और ट्रांसप्लान्ट से पहले ज़रूरी जांच के लिए समय मिल जाए।

समान या कम्पेटिबल ब्लड ग्रुप डोनर न मिलने की वजह से एबीओ-इनकम्पेटिबल एमरजेन्सी लिवर डोनर लाईव ट्रांसप्लान्ट की योजना बनाई गई। बच्ची की मां ने लिवर डोनेट करने का फैसला लिया। भर्ती के 31 घण्टे बाद, 27 मार्च को लिवर ट्रांसप्लान्ट की प्रक्रिया शुरू हुई। दो दिन बाद उसे वेंटीलेटर से हटाया गया, इसके बाद बच्ची को होश आ गया। इस जीवन रक्षक लिवर ट्रांसप्लान्ट के बारे में बात करते हुए डॉ अनुपम सिब्बल, ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर एवं सीनियर पीडिएट्रिक गैस्ट्रोएंट्रोलोजिस्ट, अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप ने कहा, ‘‘इस मामले की गंभीरता को देखते हुए बच्ची को भर्ती के तुरंत बाद वेंटीलेटर पर डालना पड़ा।

सर्जरी से पहले जांच और फिर फिर ट्रांसप्लान्ट सर्जरी दोनों ही मुश्किल थे क्योंकि इस मामले में डोनर एबीओ इनकम्पेटिबल था। यह बेहद दुर्लभ मामला था, जहां भर्ती के 31 के घण्टे के अंदर लाईव लिवर ट्रांसप्लानट किया गया। अपोलो के लिवर ट्रांसप्लान्ट प्रोग्राम के तहत अब तक हो चुके 432 पीडिएट्रिक लिवर ट्रांसप्लान्ट्स में से यह पहला मामला था जहां मरीज़ के रिश्तेदार डोनर के साथ एमरजेन्सी एबीओ इन्कम्पेटिबल ट्रांसप्लान्ट हुआ।’

डॉ नीरव गोयल, सीनियर कन्सलटेन्ट, लिवर ट्रांसप्लान्ट, इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स ने कहा, ‘‘विल्सन्स रोग एक दुर्लभ रोग है, जिसके लक्षण बेहद गंभीर होते हैं, अगर समय रहते इसका इलाज न हो तो स्थिति जानलेवा हो सकती है। यह बच्ची जब हमारे पास आई, उसका लिवर फेलियर हो चुका था, दिमाग में अमोनिया कंटेंट के कारण सूजन थी, बच्ची कोमा के चलते बेहोशी की हालत में थी। अपोलो में, हमने परिवार को तुरंत लिवर ट्रांसप्लान्ट की सलाह दी। जिसके बाद बच्ची ठीक है, सर्जरी के 17वें दिन 12 अप्रैल को उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।’

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