आजादी के दशकों बाद आम नागरिक को तिरंगा फहराने का हक कैसे मिला? जानिए पूरी कहानी

आजादी के बाद जब भारत एक संप्रभु राष्ट्र बना, तब यह आम धारणा थी कि हर भारतीय को अपने घर, दफ्तर या सार्वजनिक स्थान पर तिरंगा फहराने की पूरी आज़ादी होगी। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग थी। 15 अगस्त 1947 के बाद भी करीब 55 वर्षों तक आम नागरिक को अपनी मर्जी से तिरंगा फहराने की अनुमति नहीं थी। भारतीय ध्वज संहिता (Flag Code of India) के सख्त नियमों के कारण तिरंगा फहराना केवल सरकारी इमारतों और विशेष अवसरों तक सीमित था। आम लोग अगर अपने घर पर तिरंगा लगाना चाहते, तो उन्हें कानूनी अड़चनों और पाबंदियों का सामना करना पड़ता था। इसी व्यवस्था को चुनौती देने का साहस किया कर्नाटक के उद्योगपति और सामाजिक कार्यकर्ता नवीन जिंदल ने।
नवीन जिंदल को यह बात बेहद खलती थी कि जिस देश के लिए करोड़ों लोगों ने बलिदान दिया, उसी देश का झंडा फहराने से नागरिकों को रोका जा रहा है। वर्ष 1995 में उन्होंने अपने स्टील प्लांट पर तिरंगा फहराया, जिसके बाद उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई। इसे उन्होंने व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का हनन माना। इसके बाद नवीन जिंदल ने लंबी कानूनी लड़ाई शुरू की और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। उन्होंने दलील दी कि तिरंगा फहराना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षण मिलना चाहिए।
लगभग सात साल चली इस ऐतिहासिक लड़ाई के बाद वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि सम्मान और गरिमा के साथ तिरंगा फहराना हर भारतीय नागरिक का मौलिक अधिकार है। इसके बाद सरकार को भारतीय ध्वज संहिता में संशोधन करना पड़ा और आम लोगों को अपने घर, कार्यालय और संस्थानों पर तिरंगा फहराने की अनुमति मिली। यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं थी, बल्कि पूरे देश के नागरिकों के अधिकारों की जीत थी।
आज जब हर घर तिरंगा अभियान, राष्ट्रीय पर्वों पर घर-घर झंडा फहराने की परंपरा और तिरंगे के प्रति गर्व दिखाई देता है, तो उसके पीछे नवीन जिंदल की यह ऐतिहासिक लड़ाई छिपी है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि एक जागरूक नागरिक अगर संकल्प ले, तो वह पूरे देश की सोच और व्यवस्था को बदल सकता है।



