RBI के नए नियम से भारतीय बैंकों को फायदा, ₹2 लाख करोड़ के बाजार पर नजर

भारतीय रिजर्व बैंक ने कंपनियों के अधिग्रहण के लिए बैंक फाइनेंसिंग से जुड़े नियमों में बदलाव किया है। नए नियम 1 जुलाई 2026 से लागू हुए। इससे पात्र भारतीय बैंक अब निर्धारित शर्तों के तहत कंपनियों को दूसरी कंपनियों में नियंत्रण हासिल करने के लिए कर्ज दे सकते हैं।
पहले घरेलू बैंकों के लिए इस तरह की अधिग्रहण फाइनेंसिंग पर नियामकीय पाबंदियां थीं। इसके चलते कई बड़े सौदों में विदेशी बैंकों, निजी क्रेडिट फंडों और कंपनियों के अपने संसाधनों की अहम भूमिका रहती थी। नए ढांचे ने भारतीय बैंकों को भी इस बाजार में सीधे भाग लेने का अवसर दिया है।
₹2 लाख करोड़ का बाजार, ₹10,000 करोड़ से ज्यादा की फंडिंग
इकनॉमिक टाइम्स की 22 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, नए नियम लागू होने के बाद भारतीय बैंकों ने लगभग एक दर्जन से अधिक मर्जर एंड एक्विजिशन सौदों में ₹10,000 करोड़ से ज्यादा की फंडिंग की है। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, भारत में अधिग्रहण फाइनेंसिंग का संभावित बाजार करीब ₹2 लाख करोड़ का है।
पिछले तीन वर्षों में भारत में M&A सौदों का औसत सालाना मूल्य करीब 50 अरब डॉलर रहा। हालांकि, सभी अधिग्रहणों को बैंक से कर्ज नहीं मिलता और ₹2 लाख करोड़ का आंकड़ा संभावित बाजार का अनुमान है, न कि बैंकों द्वारा दी जा चुकी कुल फंडिंग।
SBI समेत कई बैंक दौड़ में आगे
इस नए कारोबार में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) सक्रिय दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, SBI ने करीब एक दर्जन सौदों में हिस्सा लिया है, जिनमें कुछ पूरे हो चुके हैं और कुछ विभिन्न चरणों में हैं।
इसके अलावा HDFC बैंक, ICICI बैंक, एक्सिस बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक और RBL बैंक जैसे घरेलू बैंक भी अधिग्रहण फाइनेंसिंग के अवसर तलाश रहे हैं। HSBC, सिटीबैंक, MUFG और बार्कलेज जैसे विदेशी बैंक भी इस बाजार में सक्रिय हैं। इसका मतलब यह है कि भारतीय बैंकों की भागीदारी बढ़ने के बावजूद विदेशी बैंकों की भूमिका समाप्त नहीं हुई है।
बैंक किसी कंपनी के अधिग्रहण के लिए कितना कर्ज दे सकते हैं?
RBI के नए ढांचे के तहत पात्र बैंक किसी अधिग्रहण के स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर उसकी कीमत का अधिकतम 75% तक फाइनेंस कर सकते हैं। शेष राशि खरीदार कंपनी को अपने संसाधनों से जुटानी होती है। इसके साथ ही बैंक के लिए पात्रता, जोखिम प्रबंधन, कर्ज की सीमा और सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन करना जरूरी है।
यह सुविधा हर कंपनी या हर सौदे के लिए स्वतः उपलब्ध नहीं है। उधार लेने वाली कंपनी को निर्धारित वित्तीय मानदंडों और बैंक की आंतरिक नीति पर खरा उतरना होता है। बैंक सौदे का स्वतंत्र मूल्यांकन और जोखिम की जांच करने के बाद ही कर्ज देने का निर्णय लेता है।
किन सौदों में हो सकती है बैंक फाइनेंसिंग?
अधिग्रहण फाइनेंसिंग का इस्तेमाल पात्र कंपनियां दूसरी घरेलू या विदेशी कंपनियों में नियंत्रण हासिल करने के लिए कर सकती हैं। इससे कंपनियों को पूरा पैसा अपनी बैलेंस शीट से खर्च करने के बजाय बैंक कर्ज और अपनी पूंजी के संयोजन से अधिग्रहण करने का अवसर मिलता है।
रिपोर्ट में क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन द्वारा FMC कॉर्पोरेशन के भारतीय कारोबार का ₹2,268 करोड़ में अधिग्रहण और वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज द्वारा एसोसिएटेड पावर स्ट्रक्चर्स में 55% हिस्सेदारी खरीदने के ₹1,225 करोड़ के सौदे जैसे उदाहरण दिए गए हैं।
भारतीय बैंकों के लिए क्या बदल सकता है?
इस व्यवस्था से घरेलू बैंकों को बड़े कॉर्पोरेट ग्राहकों के साथ अपने कारोबारी संबंध बढ़ाने और कर्ज से आय अर्जित करने के नए अवसर मिल सकते हैं। अधिक बैंकों के भाग लेने से कंपनियों को फंडिंग के अतिरिक्त विकल्प मिल सकते हैं और सौदों की शर्तों पर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ सकती है।
हालांकि, अधिग्रहण के लिए दिया गया कर्ज जोखिम से मुक्त नहीं होता। यदि खरीदी गई कंपनी का कारोबार उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं करता या कर्ज लेने वाली कंपनी की वित्तीय स्थिति कमजोर होती है, तो बैंक को नुकसान का जोखिम हो सकता है। इसलिए RBI ने फाइनेंसिंग के लिए कई नियामकीय शर्तें और जोखिम नियंत्रण तय किए हैं।
निष्कर्ष: RBI के नए अधिग्रहण फाइनेंसिंग नियमों से भारतीय बैंकों को उस बाजार में अधिक सक्रिय होने का मौका मिला है, जहां पहले विदेशी बैंकों और अन्य वित्तीय स्रोतों की अहम भूमिका थी। SBI और अन्य घरेलू बैंक इस अवसर का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, ₹2 लाख करोड़ संभावित बाजार का अनुमान है; वास्तविक कारोबार की वृद्धि पात्र सौदों, कंपनियों की मांग और बैंकों की जोखिम लेने की क्षमता पर निर्भर करेगी।



