भारत सरकार ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) और लद्दाख, भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं। यह बयान उस लंबे संघर्ष और भू-राजनीतिक विवाद का हिस्सा है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1947 के बाद से चला आ रहा है। भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मांग करता रहा है कि पाकिस्तान अवैध रूप से कब्जा किए गए कश्मीर के हिस्से को खाली करे और वहाँ से अपने सैन्य बलों को हटाए।
भारत का रुख शुरू से स्पष्ट रहा है कि जम्मू-कश्मीर राज्य का पूरा क्षेत्र, जिसमें पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल हैं, भारतीय संघ का अभिन्न हिस्सा है। पाकिस्तान ने वर्ष 1947 में कबायलियों और अपनी सेना के माध्यम से इस क्षेत्र के कुछ हिस्सों पर अवैध कब्जा कर लिया था। तब से लेकर अब तक भारत लगातार इस पर आपत्ति जताता आया है और संयुक्त राष्ट्र में भी इस मुद्दे को कई बार उठाया गया है।
हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बार फिर पाकिस्तान से साफ शब्दों में कहा है कि उसे पीओके समेत सभी कब्जाए गए क्षेत्रों को तुरंत खाली करना चाहिए। मंत्रालय ने यह भी कहा कि पाकिस्तान द्वारा इन क्षेत्रों में किसी भी तरह के राजनीतिक या प्रशासनिक बदलाव को भारत मान्यता नहीं देता और इसे अवैध मानता है।
भारत सरकार द्वारा 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित करने के बाद से यह रुख और अधिक सशक्त रूप में सामने आया है। इसके बाद से पाकिस्तान की ओर से लगातार आपत्तियाँ जताई गई हैं, लेकिन भारत ने हर बार स्पष्ट किया है कि यह उसका आंतरिक मामला है और किसी भी बाहरी देश को इस पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है।
लद्दाख क्षेत्र विशेष रूप से सामरिक दृष्टि से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र चीन और पाकिस्तान की सीमाओं से सटा हुआ है। भारत ने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में सैन्य और नागरिक दोनों आधारभूत संरचनाओं को मजबूत किया है। वहीं पीओके में चीन द्वारा “चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (CPEC)” परियोजना के तहत निर्माण कार्य भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है, जिस पर भारत लगातार आपत्ति जताता आया है।
भारत की यह नीति स्पष्ट है—पीओके और लद्दाख भारतीय भूभाग हैं, और पाकिस्तान का कोई भी दावा या कार्रवाई इन्हें भारत से अलग नहीं कर सकती। आने वाले समय में इस मुद्दे पर कूटनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय समर्थन को और तेज किया जा सकता है।



